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________________ आदिपुररणम् मालिनी इति 'भुवनपतीनामचनीयोऽभिगम्यः सकलगुणमणीनामाकरः पुण्यमूत्तिः । समममरकुमारनिर्विशन् दिव्यमोगानरमत चिरमस्मिन् पुण्यगेहं सदेवः ॥२१॥ प्रतिदिनममरेन्द्रोपाहृतान् भोगसारान् सुरभिकुसुममालाचित्रभूषाम्बरादीन् । ललितसुरकुमाररिणितजैवयस्यैः सममुपहितरागः सोऽन्वभूत् पुण्यपाकात् ॥२११॥ . शार्दूलविक्रीडितम् स श्रीमान्नसुरासुरार्चितपदी बालेऽप्यबालकियों लीलाहास विलासवेषचतुरामाविभ्रदुच्चस्तनुम् । तन्वानः प्रमदं जगज्जनमनःप्रह्लादिभिर्वाक्करर्बालेन्दुववृधे शनैरमलिनः कीरत्युंज्ज्वलच्चन्द्रिकः॥२१२ तारालीतरला' दधत् समुचितां वक्षस्थलासंगिनी लक्ष्यान्दोलनवल्लरीमिव ततां तां हारयष्टिं पृथुम् । ज्योत्स्नामन्यमयांशुकं "परिदधत्काञ्चीकलापाशितं रेजेऽसौ सुरदारकैर डुसमैः क्रोडजिनेन्दुभृशम् ॥ इत्या भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणश्रीमहापुराणसंग्रहे __ भगवज्जातकोत्सववर्णनं नाम चतुर्दशं पर्व ॥१४॥ साथ अपने-अपने समयके योग्य क्रीड़ा और विनोद करते हुए भगवान वृषभदेव सुखपूर्वक रहते थे ।।२०।। इस प्रकार जो तीन लोकके अधिपति-इन्द्रादि देवोंके द्वारा पूज्य हैं, आश्रय लेने योग्य हैं, सम्पूर्ण गुणरूपी मणियोंकी खान हैं और पवित्र शरीरके धारक हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव महाराज नाभिराजके पवित्र घरमें दिव्य भोगते हुए देवकुमारोंके साथ-साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करते रहे ।।२१०॥ वे भगवान् पुण्यकर्मके उदयसे प्रतिदिन इन्द्रके द्वारा भेजे हुए सुगन्धित पुष्पांकी माला, अनेक प्रकारके वस्त्र तथा आभूषण आदि श्रेष्ठ भोगोंका अपना अभिप्राय जाननेवाले सुन्दर देवकुमारोंके साथ प्रसन्न होकर अनुभव करते थे। २११ ॥ जिनके चरण-कमल मनुष्य, सुर और असुरोंके द्वारा पूजित हैं, जो बाल्य अवस्था में भी वृद्धोंके समान कार्य करनेवाले हैं, जो लीला, आहार, विलास और वेषसे चतुर, उत्कृष्ट तथा ऊँचा शरीर धारण करते हैं, जो जगत्के जीवोंके मनको प्रसन्न करनेवाले अपने वचनरूपी किरणोंके द्वारा उत्तम आनन्दको विस्तृत करते हैं, निर्मल हैं, और कीर्तिरूपी फैलती हुई 'चाँदनीसे शोभायमान हैं ऐसे भगवान वृषभदेव बालचन्द्रमाके समान धीरे-धीरे वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे ॥२१२।। ताराओंकी पंक्तिके समान चंचल लक्ष्मीके झूलेकी लताके समान, समुचित, विस्तृत और वक्षस्थलपर पड़े हुए बड़े भारी हारको धारण किये हुए तथा करधनीसे सुशोभित चाँदनी तुल्य वस्रोंको पहने हुए वे जिनेन्द्ररूपी चन्द्रमा नक्षत्रोंके समान देवकुमारोंके साथ क्रीड़ा करते हुए अतिशय सुशोभित होते थे ॥२१३॥ इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवज्जिनसनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह में __ भगवज्जातकोत्सववर्णन नामका चौदहवाँ पर्व समाप्त हुभा ॥१४॥ १. जगत्पतिपूजनीयः । २. आश्रयणीयः । ३. पवित्रगेहे । ४. उपानीतान् । ५. प्राप्त रागः । ६.-पाकान् स० । ७. वृद्धव्यापारः । ८.-हार-ल० । ९. सुमुदं ल०।१०. कीयुच्छ्वलच्च-ल.। ११. तारानिकरवत् कात्या चञ्चलाम । १२. प्रेन्बोलिकारज्जम् । १३. आत्मानं ज्योत्स्ना मन्यमानम् । १४. परिधानं कुर्वन् । १५. कलापान्वितम् अ०, द०, स०।१६. नक्षत्रसदशः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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