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________________ एकादशं पर्व २४५ अहो विषयिणां व्यापत्पनेन्द्रियवशात्मनाम् । विषयामिषगृनूनामचिन्त्यं दुःखमापुषाम् ॥१९७॥ वने वनगजास्तुशा यूथपाः प्रोन्मदिष्णवः । अवपातेषु सोदन्ति करिणीस्पर्शमोहिताः ॥१९॥ सरन् सरसि संफुल्लकहारस्वादुवारिणि । मत्स्यो बडिशमांसार्थी जीवनाशं प्रणश्यति ॥१५९॥ मधुव्रतो सदामोदमाजिघ्रन मददन्तिनाम् । मृत्युमायते गुअन कर्णतालाभिताडनैः ॥२०॥ पतङ्गः पवनालोलदीपाचिंषि पतन मुहुः । मृत्युमिमहत्यनिच्छोऽपि मषिसाग तविग्रहः ॥२०१॥ यथेष्टगतिका पुष्टा मृदुस्वादुतृणाकुरैः । गीतासंगान्मृति यान्ति मृगयोम॑गयोषितः ॥२०२॥ इत्येकशोऽपि विषये बहपायो निषेवितः । किं पुनर्विषयाः पुंसां सामस्स्येन निषेविताः ॥२०३॥ इतोऽयं विषयजन्तुः स्रोतोमिः सरितामिव । श्वः पतिस्वा गम्भीरे दुःखावतषु सीदति ॥२०४। विषयैर्विप्रलम्धोऽयम'धीरतिधनायति । धनायामासितो जन्तुः क्लेशानाप्नोति दुस्सहान् ॥२०५॥ विकष्टोऽसौ मुहुरातः स्याविष्टालाभे शुचं गतः । तस्य लाभेऽप्यसंतुष्टो दुःखमेवानुधावति ॥२०६॥ मनुष्य खारा पानी पीकर और भी अधिक प्यासा हो जाता है उसी प्रकार यह जीव, विषयोंके संभोगसे और भी अधिक तृष्णाको प्राप्त हो जाता है ॥१९६|| अहो, जिनकी आत्मा पंचेन्द्रियोंके विषयोंके अधीन हो रही है जो विषयरूपी मांसकी तीव्र लालसा रखते हैं और जो अचिन्त्य दुःखको प्राप्त हो रहे हैं ऐसे विषयी जीवोंको बड़ा भारी दुःख है ॥१९७।। वनोंमें बड़े-बड़े जंगली हाथी जो कि अपने झुण्डके अधिपति होते हैं और अत्यन्त मदोन्मत्त होते हैं वे भी हथिनीके स्पर्शसे मोहित होकर गड्ढोंमें गिरकर दुःखी होते हैं ॥१९८।। जिसका जल फूले हुए कमलोंसे अत्यन्त स्वादिष्ट हो रहा है ऐसे तालाबमें अपने इच्छानुसार विहार करनेवाली मछली वंशीमें लगे हुए मांसकी अभिलाषासे प्राण खो बैठती है-वंशीमें फंसकर मर जाती है ।।१९९।। मदोन्मत्त हाथियोंके मदको वास प्रहण करनेवाला भौंरा गुंजार करता हुआ उन हाथियोंके कर्णरूपी बोजनोंके प्रहारसे मृत्युका आह्वान करता है ।।२००। पतंग वायुसे हिलती हुई दीपक-. की शिखापर बार-बार पड़ता है जिससे उसका शरीर स्याहीके समान काला हो जाता है और वह इच्छा न रखता हुआ भी मृत्युको प्राप्त हो जाता है ॥२०१॥ इसी प्रकार जो हरिणियाँ जंगलमें अपने इच्छानुसार जहाँ-तहाँ घूमती हैं तथा कोमल और स्वादिष्ट तृणके अंकुर चरकर पुष्ट रहती हैं वे भी शिकारीके गीतोंमें आसक्त होनेसे मृत्युको प्राप्त हो जाती हैं ।२०२।। इस प्रकार जब सेवन किया हुआ एक-एक इन्द्रियका विषय अनेक दुःखोंसे भरा हुआ है तब फिर समस्त रूपसे सेवन किये हुए पाँचों ही इन्द्रियोंके विषयोंका क्या कहना है?।।२०।। जिस प्रकार नदियोंके प्रवाहसे खींचा हुआ पदार्थ किसी गहरे गड्ढे में पड़कर उसकी भँवरोंमें फिरा करता है उसी प्रकार इन्द्रियोंके विषयोंसे खींचा हुआ यह जन्तु नरकरूपी गहरे गड्ढे में पड़कर दुःखरूपी भँवरोंमें फिरा करता है और दुःखी होता रहता है ॥२०४|| विषयोंसे ठगा हुआ यह मुर्ख जन्तु पहले तो अधिक धनकी इच्छा करता है और उस धनके लिए प्रयत्न करते समय दुःखी होकर अनेक क्लेशोंको प्राप्त होता है। उस समय क्लिष्ट होनेसे यह भारी दुःखी होताहै। यदि कदाचित् मनचाही वस्तुओंकी प्राप्ति नहीं हुई तो शोकको प्राप्त होता है। और यदि मनचाही वस्तुकी प्राप्ति भी हो गयी तो उतनेसे सन्तुष्ट नहीं होता जिससे फिर भी उसी दुःखके १. लुब्धानाम् । २. -मोयुषाम् अ०, ५०, द०, स०, ल० । ३. जलपातनार्थगर्तेषु । ४. 'वडिशं मत्स्यबन्धनम्। ५. जीवन्नेव नश्यतीत्यर्थः । ६. -हमतिका:द०, ट०। एतिकाः चरन्त्यः। आ समन्तात् इतिर्गमनं यासां ताः, अथवा एतिकाः नानावः । ७. आसक्तेः । ८. व्याधस्य। ९. एकैकम् । १० नरके गर्ने। ११. विप्रलुब्धोऽय-अ०1१२. अतिशयेन वाञ्छति । १३. धनवाञ्छया आयस्तः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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