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________________ २४६ आदिपुराणम् ततस्तद्वागतद्द्वेषदूषितामा जडाशयः । कर्म बध्नाति दुर्मोच येनामुत्रावसीदति ॥२०॥ कर्मणानेन दौःस्थित्यं दुर्गतावनुसंश्रितः । दुःखासिकामवाप्नोति महतीमतिगर्हिताम् ॥२०॥ विषयानीहते दुःखी तत्प्राप्तावतिगृद्धिमान् । ततोऽतिदुरनुष्ठानैः कर्म बध्नात्यशर्मदम् ॥२०९॥ इति भूयोऽपि तेनैव चक्रकेण परिभ्रमन् । संसारापारदुर्वाद्धौं पतत्यत्यन्तदुस्तरे ॥२१०॥ तस्माद् विषयजामेना मस्वानर्थपरम्पराम् । विषयेषु रतिस्त्याज्या तीव्रदुःखानुबन्धिषु ॥२१॥ कारीषाग्नीष्टकापाकतार्णानिसहशा मताः । त्रयोऽमी वेदसंतापास्तद्वाअन्तुः कथं सुखी ॥२१२॥ ... ततोऽधिकमिदं दिव्यं सुखमप्रविचारकम् । देवानामहमिन्द्राणामिति निश्रिनु मोगध ॥२१३॥ सुखमेतेन सिद्धानामत्युक' विषयातिगम् । अप्रमेयमनन्तं च यदात्मोत्थमनीरशम् ॥२१॥ यदिव्यं यश्च मानुष्यं सुखं त्रैकाल्यगोचरम् । तत्सर्व पिण्डितं नाघ: सिद्धक्षणसुखस्य च ॥२१५।। सिद्धानां सुखमात्मोत्थमन्याबाधमकर्मजम् । परमाहादरूपं तदनौपम्यमनुत्तरम् ॥२१६॥ सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्काः शीतीभूता निरुत्सुकाः । सिद्धाश्चेत् सुखिनः सिद्धमहमिन्द्रास्पदे सुखम् ॥२१७॥ लिए दौड़ता है ।।२०५-२०६।। इस प्रकार यह जीव राग-द्वेषसे अपनी आत्माको दूषित कर ऐसे कमोंका बन्ध करता है जो बड़ी कठिनाईसे छूटते हैं और जिस कर्मबन्धके कारण यह जीव परलोकमें अत्यन्त दुःखी होता है ।।२०७। इस कर्मबन्धके कारण ही यह जीव नरकादि दुर्गतियोंमें दुःखमय स्थितिको प्राप्त होता है और वहाँ चिरकाल तक अतिशय निन्दनीय बड़ेबड़े दुःख पाता रहता है ॥२०८।। वहाँ दुःखी होकर यह जीव फिर भी विषयोंकी इच्छा करता है और उनके प्राप्त होनेमें तीन लालसा रखता हुआ अनेक दुष्कर्म करता है जिससे दुःख देनेवाले कर्मोंका फिर भी बन्ध करता है । इस प्रकार दुःखी होकर फिर भी विषयोंकी इच्छा करता हैं, उसके लिए दुष्कर्म करता है, खोटे कर्मोका बन्ध करता है और उनके उदयसे दुःख भोगता है। इस प्रकार चक्रक रूपसे परिभ्रमण करता हुआ जीव अत्यन्त दुःखसे तैरने योग्य संसाररूपी अपार समुद्र में पड़ता है ।।२०९-२१०।। इसलिए इस समस्त अनर्थ-परम्पराको विषयोंसे उत्पन्न हुआ मानकर तीत्र दुःख होनेवाले विषयोंमें प्रीतिका परित्याग कर देना चाहिए ।।२१।। जब कि स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद इन तीनों ही वेदोंके सन्ताप-क्रमसे सूखे हुए कण्डेकी अग्नि, ईटोंके अंबाकी अग्नि और तृणकी अग्निके समान माने जाते हैं तब उन वेदोंकोधारण करनेवाला जीव सुखी कैसे हो सकता है ।२१२। इसलिए हे श्रेणिक, तू निश्चय कर कि अहमिन्द्र देवोंका जो प्रवीचाररहित दिव्य सुख है वह विषयजन्य सखसे कहीं अधिक है।।२१३।। इस उपर्युक्त कथनसे सिद्धोंके उस सखका भी कथन हो जाता है जो कि विषयोंसे रहित है, प्रमाणरहित है, अन्तरहित है, उपमारहित है और केवल आत्मासे ही उत्पन्न होता है ॥२१४।। जो स्वर्गलोक और मनुष्यलोकसम्बन्धी तीनों कालोंका इकट्ठा किया हुआ सुख है वह सिद्ध परमेष्ठीके एक क्षणके सुखके बराबर भी नहीं है ।।२१५।। सिद्धोंका वह सुख केवल आत्मासे ही उत्पन्न होता है, बाधारहित है, कर्मोके क्षयसे उत्पन्न होता है, परम आह्लाद रूप है, अनुपम है और सबसे श्रेष्ठ है ।।२१६।। जो सिद्ध परमेष्ठी सब परिग्रहोंसे रहित हैं, शान्त हैं और उत्कण्ठासे रहित हैं जब वे भी सुखी माने जाते हैं तब अहमिन्द्र पदमें तो सुख अपने-आप ही सिद्ध हो जाता है । भावार्थ-जिसके परिग्रहका एक अंश मात्र भी नहीं है ऐसे सिद्ध भगवान् ही जब १. ततः कारणात् । २. इष्टलामालाभरागद्वेष । ३. कर्मणा तेन अ०, ५०, स०, द०। ४. दुःस्थितिम्, दुःखेनावस्थानम् । ५. विषयप्राप्ती। ६. लोभवान् । ७. ततः लोभात् । ८. तद्वज्जन्तु: म०, ल०। ९. ततः कारणात् । १०. अहमिद्र सुखप्रतिपादनप्रकारेण । ११. अतिशयेनोक्तम् । १२. मूल्यम् । १३. द्वन्द्वः परिग्रहः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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