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________________ १६६ आदिपुराणम् स्वमादिः सर्वविद्यानां स्वमादिः सर्वयोगिनाम् । स्वमादिर्धर्मतीर्थस्य स्वमादिर्गुहरङ्गिनाम् ॥३१॥ स्वं 'सार्वः सर्ववियेशः सर्वकोकानलोकथाः । स्तुतिवादस्तबैतावानलमास्तां सविस्तरः ॥३१५॥ वसन्ततिलकम् स्वां देवमिस्थममिवन्ध कृतप्रणामो नान्यत् फलं परिमितं परिमार्गयामि । स्वय्येव मक्किमचलां जिन मे दिश स्वं सा सर्वमभ्युदयमुक्तिफलं प्रसूते ॥३१६॥ शार्दूलविक्रीडितम् इत्युच्चैः प्रणिपत्य तं जिनपतिं स्तुत्वा कृताभ्यर्चनः, स श्रीमान् मुनिवृन्दमप्यनुगमात् संपूज्य निष्कल्मषम् । श्रीमत्या सह वज्रजंघनृपतिस्तामुत्तमर्दि पुरीम्, प्राविक्षत् प्रमदोदयाजिनगुणान् भूयः स्मरन् भूतये ॥३१॥ लक्ष्मीमानभिषेकपूर्वकमसौ श्रीवज्रजको भुवि, द्वात्रिंशन्मुकुटप्रबदमहित मामृत्सहस्रर्मुहुः । तां कल्याणपरम्परामनुमवन् भोगान् परानिर्विशन् ,श्रीमत्या सह दीर्घकालमवसत्तस्मिन् पुरेऽर्चन् जिनान्॥३१॥ इत्याचे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे श्रीमतीवज्रजबसमागमवर्णनं नाम सप्तमं पर्व ॥७॥ प्रकाशित करनेवाली ज्योति हैं, आप ही समस्त जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, आप ही समस्त संसारके एकमात्र बन्धु हैं और आप ही समस्त लोकके एकमात्र गुरु हैं ॥३१३॥ आप ही सम्पूर्ण विद्याओंके आदिस्थान हैं, आप ही समस्त योगियोंमें प्रथम योगी हैं, आप ही धर्मरूपी तीर्थके प्रथम प्रवर्तक हैं, और आप ही प्राणियोंके प्रथम गुरु हैं ॥३१४ ॥ आप ही सबका हित करनेवाले हैं, आप ही सब विद्याओंके स्वामी हैं और आपही समस्त लोकको देखनेवाले हैं। हे देव, आपकी स्तुतिका विस्तार कहाँतक किया जाये। अबतक जितनी स्तुति कर चुका हूँ मुझ-जैसे अल्पज्ञके लिए उतनी ही बहुत है ।। ३१५ ॥ हे देव, इस प्रकार आपकी बन्दना कर मैं आपको प्रणाम करता हूँ और उसके फलस्वरूप आपसे किसी सीमित अन्य फलकी याचना नहीं करता हूँ। किन्तु हे जिन, आपमें ही मेरी भक्ति सदा अचल रहे यही प्रदान कीजिए क्योंकि वह भक्ति ही स्वर्ग तथा मोक्षके उत्तम फल उत्पन्न कर देती है ।। ३१६ ।। इस प्रकार श्रीमान् वनजंघ राजाने जिनेन्द्र देवको उत्तम रीतिसे नमस्कार किया, उनकी स्तुति और पूजा की। फिर राग-द्वेषसे रहित मुनिसमूहकी भी क्रमसे पूजा की। तदनन्तर श्रीजिनेन्द्रदेवके गुणोंका बार-बार स्मरण करता हुआ वह वनजंघ राज्यादिकी विभूति प्राप्त करनेके लिए हर्षसे श्रीमतीके साथ-साथ अनेक ऋद्धियोंसे शोभायमान पुण्डरीकिणी नगरीमें प्रविष्ट हुआ। ३१७ ।। वहाँ भरतभूमिके बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजाओंने उस लक्ष्मीवान् वनजंघका राज्याभिषेकपूर्वक भारी सम्मान किया था। इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करते हुए हजारों राजाओंके द्वारा बार-बार प्राप्त हुई कल्याणपरम्पराका अनुभव करते हुए और श्रीमतीके साथ उत्तमोत्तम भोग भोगते हुए वनजंघने दीर्घकाल तक उसी पुण्डरीकिणी नगरीमें निवास किया था ॥ ३१८ ॥ इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवजिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें श्रीमती और वज्रजंघके समागमका वर्णन करनेवाला सातवाँ पवें पूर्ण हुभा ॥७॥ १. सर्वेभ्यो हितः । २. मृगये । ३. अनुक्रमात् । ४. महितः क्षमाभृत् अ०, स० । ५. अनुभवन् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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