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________________ सप्तमं पर्व नोपरोद्धमलं देव तव बैराग्यसंपदम् । सुरेविरचितो मस्या प्रातिहार्यपरिच्छदः ॥३०२॥ करिकेसरिदावाहिनिषाद विषमाब्धयः । रोगा बन्धाच शाम्यन्ति त्वत्पदानुस्मृतेर्जिन ॥३०३॥ करटक्षर दुद्दाममदाम्बुकृतदुर्दिनम् । 'गजमाघातुकं मां जयन्ति त्वदनुस्मृतः ॥३०४॥ करीन्द्रकुम्मनिर्भदकठोरनखरो हरिः । क्रमेऽपि पतितं जन्तुं न हन्ति त्वत्पदस्मृतेः ॥३०॥ नोपद्रवति दीप्तार्चिरप्यर्चिष्मान् ‘समुस्थितः । त्वत्पदस्मृतिशीताम्बुधाराप्रशमितोदयः ॥३०६॥ फणी कृतफणो रोषादुद्गिरन् गरमुल्वणम् । स्वत्पदागर्दै'संस्मृत्या सद्यो भवति निर्विषः ॥३०७॥ वने प्रचण्डलुण्टाककोदण्डरवभीषणे । सार्थाः' सार्थाधिपाः स्वैरं प्रयान्ति स्वत्पदानुगाः ॥३०॥ अपि चण्डानिलाकाण्ड"जम्मणापूर्णितासम् । तरन्त्यर्णवमुद्वेलं हेलया स्वत्क्रमाश्रिताः ॥३०९॥ अप्यस्थानकृतोत्थानतीव्रव्रणरुजो जनाः । सोमवन्त्यनातङ्काः स्मृतत्वत्पदभेषजाः ॥३१०॥॥ कर्मबन्धविनिर्मुकं स्वामनुस्मृत्य मानवः । रढबन्धनबद्धोऽपि भवत्याशु विशृङ्खलः ॥३११॥ इति विनितविघ्नौचं' भक्तिनिध्नेन चेतसा । पर्युपासे जिनेन्द्र त्वां विघ्नवर्गोपशान्तये ॥३१२॥ स्वमेको जगतां ज्योतिस्त्वमेको जगतां पतिः । स्वमेको जगतां बन्धुस्त्वमको जगतां गुरुः ॥३१३॥ हो ॥३०१॥ हे देव, यह प्रातिहार्योंका समूह आपकी वैराग्यरूपी संपत्तिको रोकने के लिए समर्थ नहीं है क्योंकि यह भक्तिवश देवोंके द्वारा रचा गया है ।।३०२।। हे जिनदेव, आपके चरणोंके स्मरण मात्रसे हाथी, सिंह, दावानल, सर्प, भील, विषम समुद्र, रोग और बन्धन आदि सब उपद्रव शान्त हो जाते हैं ॥३०३। जिसके गण्डस्थलसे झरते हुए मदरूपी जलके द्वारा दुर्दिन प्रकट किया जा रहा है तथा जो आघात करनेके लिए उद्यत है ऐसे हाथीको पुरुष आपके स्मरण मात्रसे ही जीत लेते हैं ॥३०४।। बड़े-बड़े हाथियोंके गण्डस्थल भेदन करनेसे जिसके नख अतिशय कठिन हो गये हैं ऐसा सिंह भी आपके चरणोंका स्मरण करनेसे अपने पैरों में पड़े हुए जीवको नहीं मार सकता है ॥३०५।। हे देव, जिसकी ज्वालाएँ बहुत ही प्रदीप्त हो रही हैं तथा जो उन बढ़ती हुई ज्वालाओंके कारण ऊँची उठ रही है ऐसी अग्नि यदि आपके चरण-कमलोंके स्मरणरूपी जलसे शान्त कर दी जाये तो फिर वह अग्नि भी उपद्रव नहीं कर सकती ॥३०६।। क्रोधसे जिसका फण ऊपर उठा हुआ है और जो भयंकर विष उगल रहा है ऐसा सर्प भी आपके चरणरूपी औषधके स्मरणसे शीघ्र हो विषरहित हो जाता है ॥३०७ ॥ हे देव, आपके चरणोंके अनुगामी धनी व्यापारी जन प्रचण्ड लुटेरोंके धनुषोंकी टंकारसे भयंकर वनमें भी निर्भय होकर इच्छानुसार चले जाते हैं ।। ३०८ ।। जो प्रबल वायुकी असामयिक अचानक वृद्धिसे कम्पित हो रहा है ऐसे बड़ी-बड़ी लहरोंवाले समुद्रको भी आपके चरणोंकी सेवा करनेवाले पुरुष लीलामात्रमें पार हो जाते हैं । ३०९ ॥ जो मनुष्य कुटुंगे स्थानोंमें उत्पन्न हुए फोड़ों आदिके बड़े-बड़े घावोंसे रोगी हो रहे हैं वे भी आपके चरणरूपी औषधका स्मरण करने मात्रसे शीघ्र ही नीरोग हो जाते हैं ।। ३१० ॥ हे भगवन, आप कर्मरूपी बन्धनोंसे रहित हैं। इसलिए मजबूत बन्धनोंसे बँधा हुआ भी मनुष्य आपका स्मरण कर तत्काल ही बन्धनरहित हो जाता है ।। ३११ ॥ हे जिनेन्द्रदेव, आपने विघ्नोंके समूहको भी विनित किया है उन्हें नष्ट किया है इसलिए अपने विघ्नोंके समूहको नष्ट करने के लिए मैं भक्तिपूर्ण हृदयसे आपकी उपासना करता हूँ ॥३१२।। हे देव, एकमात्र आप ही तीनों लोकोंको १. समर्थः । २. परिकरः। ३. व्याधः । ४. बन्धनानि । ५. गण्डस्थलम् । ६. आहिंस्रकम् । आघातकं द०, ल.। ७. पादे । ८. समुच्छ्रितः प०, स०। ९. उत्थितफणः । १०. विषम् । ११. अगद भेषजम् । १२. अर्थेन सहिताः । १३. त्वत्पदोपगाः ट० । त्वत्पदसमीपस्थाः । १४. अकाण्डः अकालः । १५. विहतान्तरायसमुदायम् । १६. भक्तयधीनेन । १७. पिता।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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