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________________ १६४ आदिपुराणम् प्रसीदति भवत्पादपझे पमा प्रसीदति । विमुखे याति बैमुख्यं भवन्माभ्यस्थ्यमोशम् ॥२९॥ प्रातिहार्यमयीं भूतिं त्वं दधानोऽप्यनन्यगाम् । वीतरागो महांबासि जगत्येतज्जिनामृतम् ॥२९॥ तवायं शिशिरच्छायो मास्यशोकतमहान् । शोकमाश्रितमण्यानां विदूर मपहस्तयन् ॥२९३॥ पुष्पवृष्टिं दिवो देवाः किरन्ति स्वां जिनामितः । परितो मेरुमुत्फुल्ला यथा कल्पमहीरुहाः ॥२९॥ दिव्यभाषा तवाशेषभाषाभेदानुकारिणी। विकरोति मनोध्वान्तमवाचामपि देहिनाम् ॥२९५॥ प्रकीर्णकयुगं माति त्वां जिनोमयतो धुतम् । पतविरसंवादि शशाकरनिर्मलम् ॥२९॥ चामीकरविनिर्माण हरिमितमासनम् । गिरीन्द्रशिखर स्पर्दि राजते जिनराज ते ॥२९॥ ज्योतिर्मण्डलमुत्सर्पत् तवालंकुरुते तनुम् । मार्तण्डमण्डलद्वेषि विधुन्वजगतां तमः ॥२९॥ तवोद्घोषयतीवोच्चैः जगतामेकमर्तृताम् । दुन्दुमिस्तनितं मन्द्रमुचरपथि वार्मुचाम् ॥२९९॥ तवाविष्कुरुते देव प्राभवं भुवनातिगम् । विधुबिम्बप्रतिस्पर्दि छन्त्रत्रितयमुच्छितम् ॥३०॥ विभ्राजते जिनैतत्ते प्रातिहार्यकदम्बकम् । त्रिजगत्सारसर्वस्वमिवैकत्र समुचितम् ॥३०१॥ नहीं है यह भारी आश्चर्यकी बात है (पक्षमें आपके द्वारा छेदी जानेपर बढ़ती नहीं है. अर्थात् आपने संसाररूपी लताका इस प्रकार छेदन किया है कि वह फिर कभी नहीं बढ़ती।) भावार्थसंस्कृत में 'वृधु' धातुका प्रयोग छेदना और बढ़ाना इन दो अर्थों में होता है । श्लोकमें आये हुए वर्धिता शब्दका जब 'बढ़ाना' अर्थमें प्रयोग किया जाता है तब विरोध होता है, और जब 'छेदन' अर्थमें प्रयोग किया जाता है तब उसका परिहार हो जाता है। ॥२९०।। हे भगवन, आपके चरण-कमलके प्रसन्न होनेपर लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती है और उनके विमुख होनेपर लक्ष्मी भी विमुख हो जाती है। हे देव, आपकी यह मध्यस्थ वृत्ति ऐसी ही विलक्षण है ॥२९॥ हे जिनेन्द्र, यद्यपि आप अन्यत्र नहीं पायी जानेवाली प्रातिहार्यरूप विभूतिको धारण करते हैं तथापि संसारमें परम वीतराग कहलाते हैं, यह बड़े आश्चर्यकी बात है ।।२९२।। शीतल छायासे युक्त तथा आश्रय लेनेवाले भव्य जीवोंके शोकको दूर करता हुआ यह आपका अतिशय उन्नत अशोकवृक्ष बहुत ही शोभायमान हो रहा है ॥२९॥ हे जिनेन्द्र, जिस प्रकार फूले हुए कल्पवृक्ष मेरु पर्वतके सब तरफ पुष्पवृष्टि करते हैं उसी प्रकार ये देव लोग भी आपके सब ओर आकाशसे पुष्पवृष्टि कर रहे हैं।२९४ादेव, समस्त भाषारूप परिणत होनेवाली आपकी दिव्य ध्वनि उन जीवोंके भी मनका अज्ञानान्धकार दूर कर देती है जो कि मनुष्योंकी भाँति स्पष्ट वचन नहीं बोल सकते ।।२९५।। हे जिन,आपके दोनों तरफ दुराये जानेवाले, चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल दोनों चमर ऐसे शोभायमान हो रहे हैं मानो ऊपरसे पड़ते हुए पानीके झरने ही हों।।२९६॥ हे जिनराज, मेरु पर्वतके शिखरके साथ ईर्ष्या करनेवाला और सुवर्णका बना हुआ आपका यह सिंहासन बड़ा ही भला मालूम होता है ।।२९७॥ हे देव, सूर्यमण्डलके साथ विद्वेष करनेवाला तथा जगत्के अन्धकारको दूर करनेवाला और सब ओर फैलता हुआ आपका यह भामण्डल आपके शरीरको अलंकृत कर रहा है ।।२९८॥ हे देव, आकाशमें जो दुन्दुभिका गम्भीर शब्द हो रहा है वह मानो जोर-जोरसे यही घोषणा कर रहा है कि संसारके एक मात्र स्वामी आप ही हैं ॥२९९॥ हे देव, चन्द्रबिम्बके साथ स्पर्धा करनेवाले और अत्यन्त ऊँचे आपके तीनों छत्र आपके सर्वश्रेष्ठ प्रभावको प्रकट कर रहे हैं ॥३००।। हे जिन, ऊपर कहे हुए आपके इन आठ प्रातिहार्योंका समूह ऐसा शोभायमान हो रहा है मानो एक जगह इकटे हुए तीनों लोकोंके सर्वश्रेष्ठ पदार्थोंका सार ही १. प्रसन्ने सति । २. लक्ष्मीः । ३. शीत । ४. अफ्सारयन् । ५. नाशयति । ६. चामर । ७. सदृशम् । ८. कारणम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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