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________________ सप्तमं पर्व १६३ स्वद्भतः सुखमभ्बेति लक्ष्मीस्त्वन्तमश्नुते । त्वद्भक्तिर्भुक्तये' पुंसां मुक्तये या 'स्थवीयसी ॥ २८०॥ तो मजन्ति मठयास्त्वां मनोवाक्कायशुद्धिभिः । फलार्थिभिर्भवान् सेग्यो व्यक्तं कल्पतरूयते ॥ २८१॥ स्वया प्रवर्षता धर्मवृष्टिं दुष्कर्मधर्मतः । प्रोदन्यद्भवभृवारिस्पृहां नवघनायितम् ॥ २८२॥ स्वया प्रदर्शितं मार्गमासेवन्ते हितैषिणः । भास्वता द्योतितं मार्गमिव कार्यार्थिनो जनाः ॥ २८३॥ संसारोच्छेदने बीजं त्वया तस्वं निदर्शितम् । प्रात्रिकामुत्रिकार्थानां यतः सिद्धिरिहाङ्गिनाम् ॥ २८४॥ लक्ष्मी सर्वस्वमुज्झित्वा साम्राज्यं प्राज्यवैभवम् । स्वया चित्रमुदूढास मुक्तिश्रीः स्पृहयालुना ॥ २८५॥ दयावल्लीपरिष्वको महोदर्को महोक्षतिः । प्रार्थितार्थान् प्रपुष्णाति भवान् कल्पद्रुमो यथा ॥ २८६॥ स्वया कर्ममहाशत्रूनुच्चानुच्छेत्सु मिच्छता । धर्मचक्रं तपोधारं पाणौकृतमसंभ्रमम्" ॥२८७॥ न बद्धो भ्रकुटिन्यासो न दष्टौष्ठं मुखाम्बुजम् । न मित्रसौष्ठवं स्थानं व्यरच्यरिजये त्वया ॥ २८८ ॥ दयालुनापि दुःसाध्य मोहशत्रुजिगीषया । तपःकुठारे कठिने त्वया व्यापारितः करः ॥ २८९॥ स्वया संसारदुर्वल्ली रूढाऽज्ञानजकोक्षणैः । नाना दुःखफला चित्रं "वर्द्धितापि न वर्द्धते ॥ २९० ॥ स्तुति स्वयं गणधर देव भी नहीं कर सकते तथापि मैं भक्तिवश आपकी स्तुति प्रारम्भ करता हूँ क्योंकि भक्ति ही कल्याण करनेवाली है || २७९ || हे प्रभो, आपका भक्त सदा सुखी रहता है, लक्ष्मी भी आपके भक्त पुरुषके समीप ही जाती है, आपमें अत्यन्त स्थिर भक्ति स्वर्गादिके भोग प्रदान करती है और अन्त में मोक्ष भी प्राप्त कराती है || २८०॥ इसलिए ही भव्य जीव शुद्ध मन, वचन, कायसे आपकी स्तुति करते हैं । हे देव, फल चाहनेवाले जो पुरुष आपकी सेवा करते हैं उनके लिए आप स्पष्ट रूपसे कल्पवृक्षके समान आचरण करते हैं अर्थात् मन बांछित फल देते हैं ||२८१॥ हे प्रभो, आपने धर्मोपदेशरूपी वर्षा करके, दुष्कर्मरूपी सन्तापसे अत्यन्त प्यासे संसारी जीवरूपी चातकोंको नवीन मेघके समान आनन्दित किया है ॥२८२ ॥ हे देव, जिस प्रकार कार्यकी सिद्धि चाहनेवाले पुरुष सूर्यके द्वारा प्रकाशित हुए मार्गकी सेवा करते हैं - उसी मार्ग से आते-जाते हैं उसी प्रकार आत्महित चाहनेवाले पुरुष आपके द्वारा दिखलाये हुए मोक्षमार्गकी सेवा करते हैं || २८३|| हे देव, आपके द्वारा निरूपित तव जन्ममरणरूपी संसारके नाश करनेका कारण है तथा इसीसे प्राणियोंकी इस लोक और परलोकसम्बन्धी समस्त कार्योंकी सिद्धि होती है ॥२८४|| हे प्रभो, आपने लक्ष्मीके सर्वस्वभूत तथा उत्कृष्ट वैभव से युक्त साम्राज्यको छोड़कर भी इच्छासे सहित हो मुक्तिरूपी लक्ष्मीका वरण किया है, यह एक आश्वर्यकी बात है || २८५|| हे देव, आप दयारूपी लतासे वेष्टित हैं, स्वर्ग आदि बड़े-बड़े फल देनेवाले हैं, अत्यन्त उन्नत हैं- उदार हैं और मनवाञ्छित पदार्थ प्रदान करनेबाले हैं इसलिए आप कल्पवृक्ष के समान हैं || २८६|| हे देव, आपने कर्मरूपी बड़े-बड़े शत्रुओंको नष्ट करनेकी इच्छासे तपरूपी धारसे शोभायमान धर्मरूपी चक्रको बिना किसी घबरा हटके अपने हाथमें धारण किया है ॥२८७॥ हे देव, कर्मरूपी शत्रओंको जीतते समय आपने न तो अपनी भौंह ही चढ़ायी, न ओठ ही चबाये, न मुखकी शोभा नष्ट की और न अपना स्थान ही छोड़ा है ॥२८८॥ हे देव, आपने दयालु होकर भी मोहरूपी प्रबल शत्रुको नष्ट करनेकी इच्छासे अतिशय कठिन तपश्चरणरूपी कुठारपर अपना हाथ चलाया है अर्थात् उसे अपने हाथ में धारण किया है || २८९ || हे देव, अज्ञानरूपी जलके सींचनेसे उत्पन्न हुई और अनेक दुःखरूपी फलको देनेवाली संसाररूपी लता आपके द्वारा वर्धित होनेपर भी बढ़ाये जानेपर भी बढ़ती १. भोगाय । २. स्थूलतरा । ३. पिपासत्संसारिचातकानाम् । ४. भण्डारः । ५. भूरि । ६. विवाहिता । ७. मालिङ्गितः । ८. महोत्तरफलः । ९. महोन्नतः म०, ल० । १०. तुरुच्छेत्तु अ०, प०, स०, ल०, ६० ११. अव्ययम् । १२. वर्द्धिता छेदिता च । है
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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