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________________ १६२ आदिपुराणम् गृहे गृहे महांस्तोषः केतुबन्धो गृहे गृहे । गृहे गृहे 'वराकापो बभूषांसा गृहे गृहे ॥२६९॥ दिने दिने महाँस्तोषो धर्मभक्तिर्दिने दिने । दिने दिने महेबवर्या पूज्यते स्म वधूवरम् ॥२७॥ भभापरेधुरुधावमु पोतयितुमुघमी । प्रदोषे दीपिकोद्योतः महापूतं ययौ वरः ॥२७॥ प्रयान्तमनुयाति स्म श्रीमती तं महायुतिम् । मास्वन्तमिव रुवान्धतमसं भासुरा प्रभा ॥२७२॥ 'पूजाविभूति महतीं पुरस्कृत्य जिनालयम् । प्रापदुत्तुमटानं स सुमेरुमियोच्छितम् ॥२७३॥ स तं प्रदक्षिणीकुर्वन् "सजानिर्विवमौ' नृपः । मेस्मक इव श्रीमान् महादीप्त्या परिष्कृतः ॥२७॥ "कृतेर्याशुद्धिरिददिः प्रविश्य जिनमन्दिरम् । तत्रापश्यरषीन् दीसतपसा कृतवन्दनः ॥२०५॥ ततो गन्धकुटीमध्ये जिनेन्द्रार्चा हिरण्मयीम् । पूजयामास गन्धाचैरभिषेकपुरस्सरम् ॥२०॥ कृतार्चनस्ततः स्तोतुं प्रारंभेऽसौमहामतिः।"प्रामिः स्तुतिमिः साक्षात्कृस्य स्तुत्यं जिनेश्वरम्॥२७॥ नमो जिनेशिने तुभ्यमनभ्यस्तदुराधये । स्वामचाराधयामीश कर्मशत्रुविमिस्सयो" ॥२७॥ भनन्तास्त्वद्गुणाः स्तोतुमशक्या गणपैरपि । भक्त्या तु प्रस्तुवे स्तोत्रं मतिः श्रेयोऽनुबन्धिनी॥२७९॥ समस्त बन्धुओंका सम्मान किया था तथा दासी दास आदि भृत्योंको भी सन्तुष्ट किया था ॥२६८।। उस समय घर-घर बड़ा सन्तोष हुआ था, घर-घर पताकाएँ फहरायी गयी थीं, घरघर वरके विषयमें बात हो रही थी और घर-घर वधूकी प्रशंसा हो रही थी॥२६९।। उस समय प्रत्येक दिन बड़ा सन्तोष होता था, प्रत्येक दिन धर्ममें भक्ति होती थी और प्रत्येक दिन इंन्द्रजैसी विभूतिसे वधू-घरका सत्कार किया जाता था ॥ २७० ॥ तत्पश्चात् दूसरे दिन अपना धार्मिक उत्साह प्रकट करनेके लिए उद्युक्त हुआ वनजंघ सायंकालके समय अनेक दीपकोंका प्रकाश कर महापूत चैत्यालयको गया ॥२७॥ अतिशय कान्तिका धारक वनजंघ आगे-आगे जा रहा था और श्रीमती उसके पीछे-पीछे जा रही थी। जैसे कि अन्धकारको नष्ट करनेवाले सूर्यके पीछे-पीछे उसकी देदीप्यमान प्रभा जाती है ॥ २७२ ॥ वह वनजंघ पूजाकी बड़ी भारी सामग्री साथ लेकर जिनमन्दिर पहुँचा। वह मन्दिर मेरु पर्वतके समान ऊँचा था, क्योंकि उसके शिखर भी अत्यन्त ऊँचे थे ॥ २७३ ॥ श्रीमतीके साथ-साथ चैत्यालयकी प्रदक्षिणा देता हुआ वनजंघ ऐसा शोभायमान हो रहा था जैसा कि महाकान्तिसे युक्त सूर्य मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा देता हुआ शोभायमान होता है ॥२७४।। प्रदक्षिणाके बाद उसने ईर्यापथशुद्धि की अर्थात् मार्ग चलते समय होनेवाली शारीरिक अशुद्धताको दूर किया तथा प्रमादवश होनेवाली जीवहिंसाको दूर करनेके लिए प्रायश्चित्त आदि किया । अनन्तर, अनेक विभूतियोंको धारण करनेवाले जिनमन्दिरके भीतर प्रवेश कर वहाँ महातपस्वी मुनियोंके दर्शन किये और उनकी वन्दना को । फिर गन्धकुटीके मध्यमें विराजमान जिनेन्द्रदेवकी सुवर्णमयी प्रतिमाकी अभिषेकपूर्वक चन्दन आदि द्रव्योंसे पूजा की ॥२७५-२७६।। पूजा करनेके बाद उस महाबुद्धिमान वनजंघने स्तुति करनेके योग्य जिनेन्द्रदेवको साक्षात् कर (प्रतिमाको साक्षात् जिनेन्द्रदेव मानकर) उत्तम अर्थोंसे भरे हुए स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करना प्रारम्भ किया ॥ २७ ॥ हे देव ! आप कर्मरूपी शत्रुओंको जीतनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, और मानसिक व्यथाओंसे रहित हैं इसलिए आपको नमस्कारहो। हे ईश, आज मैं कर्मरूपी शत्रुओंका नाश करनेकी इच्छासे आपकी आराधना करता हूँ ॥ २७८ ॥ हे देव, आपके अनन्त गुणोंकी १. वजजङ्घालापः । २. श्रीमती। वधूशस्या अ०, ५०, द०, स०, ल० । ३. महेन्द्रधर्या ल०। ४. उत्साहम् । ५: उद्युक्तः । ६. रात्री । ७. महापूतजिनालयम् । ८. रविम् । ९. पूजासामग्रीम् । १०. कुलपसहितः । ११. -निर्बभी म०, ल०। १२. अलंकृतः । १३. ईर्यापथविशुद्धिः । १४. सदर्थत्वात् स्पृहणीयाभिः । १५. प्रत्यक्षीकृत्य । १६. स्तोतुं योग्यम् । १७. आधिः मनःपीडा । १८. भेत्तुमिच्छया । १९. गणधरैः । २०. प्रारेभे। -
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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