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________________ सप्तमं पर्व तत्कल्याणं समालोक्य देवलोकेऽपि दुर्लभम् । प्रशशंसुर्मुदं प्रासाः परमां प्रेक्षका जनाः ॥२५७॥ चक्रवर्ती महाभागः' वीरममिदमूर्जितम् । योग्ये नियोजयामास जनश्लाघास्पदे पदे ॥२५॥ जननी पुण्यवत्वस्या मूनि सुप्रजसामसौ । सत्प्रसूतिरियं सूता यया लक्ष्मीसमपतिः ॥२५९॥ कुमारेण तपस्तप्तं किमेतेनान्यजन्मनि । येनासादि जगस्सारं बीरनममितयुति ॥२६०॥ भन्येयं कन्यका मान्या नान्या पुण्यवतीहशी । कल्याणमागिनी यैषा वज्रज पति वृता ॥२६॥ उपोषितं किमताभ्यां किंचा तप्तं तपो महत् । किं नु दत्तं किमिष्टं वा कीरग वाचरितं व्रतम् ॥२६२॥ भहो धर्मस्य माहात्म्यमहो सस्साधनं तपः। अहो दत्तिर्महोदर्का दयावल्ली फलस्यहो ॥२६३॥ नूनमाभ्यां कृता पूजा महतामहतां पराम् [स] । पूज्यपूजानुसंधत्ते ननु संपत्परम्पराम् ॥२६॥ प्रतः कल्याणमागित्वं धन दिविपुलं सुखम् । वाम्छनिरर्हता मार्गे मतिः कार्या महाफले ॥२६५॥ इत्यादिजनसंजल्पैः संश्लाघ्यो दम्पती तदा । सुखासीनौ प्रशय्यायो बन्धुमिः परिवारिती ॥२६६॥ "दीनदैन्यं समसृष्ट कार्पण्यं कृपणे "।"अनाथैच सनाथत्वं भेजे तस्मिन् महोत्सवे ॥२६॥ बन्धवो मानिताः सर्वे दानमानामिजल्पनैः । भृत्याश्च तर्पिता मा चक्रिणास्मिन् महोत्सवे ॥२६८॥ नाओंके समान क्रीड़ा करनेवाले तथा अमृतके समान आनन्द देनेवाले उन वधू और वरको जो भी देखता था उसीका चित्त आनन्दसे सन्तुष्ट हो जाता था ।। २५६ ॥ जो स्वर्गलोकमें र्लभ है ऐसे उस विवाहोत्सवको देखकर देखनेवाले पुरुष परम आनन्दको प्राप्त हुए थे और सभी लोग उसकी प्रशंसा करते थे ॥ २५७॥ वे कहते थे कि चक्रवर्ती बड़ा भाग्यशाली है जिसके यह ऐसा उत्तम स्रो-रन उत्पन्न हुआ है और वह उसने सब लोगोंकी प्रशंसाके स्थानभूत वनजंघरूप योग्य स्थानमें नियुक्त किया है ।।२५८।। इसकी यह पुण्यवती माता पुत्रवतियोंमें सबसे श्रेष्ठ है जिसने लक्ष्मीके समान कान्तिवाली यह उत्तम सन्तान उत्पन्न की है ।। २५९ ।। इस वजंघकुमारने पूर्व जन्ममें कौन-सा तप तपा था जिससे कि संसारका सारभूत और अतिशय कान्तिका धारक यह स्त्री-रत्न इसे प्राप्त हुआ है ।।२६०।। चूँकि इस कन्याने वनजंघको पति बनाया है इसलिए यह कन्या धन्य है, मान्य है और भाग्यशालिनी है। इसके समान और दूसरी कन्या पुण्यवती नहीं हो सकती ॥२६१।। पूर्व जन्ममें इन दोनोंने न जाने कौन-सा उपवास किया था, कौन-सा भारी तप तपा था, कौन-सा दान दिया था, कौन-सी पूजा की थी अथवा कौन-सा व्रत पालन किया था ।। २६२ ।। अहो, धर्मका बड़ा माहात्म्य है, तपश्चरणसे उत्तम सामग्री प्राप्त होती है, दान देनेसे बड़े-बड़े फल प्राप्त होते हैं और दयारूपी बेलपर उत्तमउत्तम फल फलते हैं ।।२६३॥ अवश्य ही इन दोनोंने पूर्वजन्ममें महापूज्य अर्हन्त देवकी उत्कृष्ट पूजा की होगी क्योंकि पूज्य पुरुषोंकी पूजा अवश्य ही सम्पदाओंकी परम्पराप्राप्त कराती रहती है ।।२६४॥ इसलिए जो पुरुषं अनेक कल्याण, धन-ऋद्धि तथा विपुल सुख चाहते हैं उन्हें स्वर्ग आदि महाफल देनेवाले श्री अरहन्त देवके कहे हुए मार्गमें ही अपनी बुद्धि लगानी चाहिए २६५। इस प्रकार दर्शक लोगोंके वार्तालापसे प्रशंसनीय वे दोनों वर-वधू अपने इष्ट बन्धुओंसे परिवारित हो सभा-मण्डपमें सुखसे बैठे थे ।।२६६।। उस विवाहोत्सवमें दरिद्र लोगोंने अपनी दरिद्रता छोड़ दी थी, कृपण लोगोंने अपनी कृपणता छोड़ दी थी और अनाथ लोग सनाथताको प्राप्त हो गये थे ।।२६७।। चक्रवर्तीने इस महोत्सबमें दान, मान, सम्भाषण आदिके द्वारा अपने १. महापुण्यवान् । २. स्थाने। ३. शोभनपुत्रवतीनाम् । ४. सती प्रसूतिर्यस्याः सा । ५. प्राप्तम् । ६. वृणीते स्म । ७. पूजितम् । ८. परा अ० ५०,०, द०, स०, ल०। ९. कारणात् । १०. दम्पत्यासने । प्रसज्यायां स०। प्रशस्यायां ल०। ११. निर्धनः। १२. लुब्धः। १३. त्यक्तम् । १४. अगतिकैः । १५. सत्कृताः । १६. दत्तिपूजाभिसम्भाषणैः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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