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________________ आदिपुराणम् कृतोपशोभे नगरे समन्ताद्वद्वतोरणे । सुरलोक इवाभाति परां दधति संपदम् ॥ २२२ ॥ राजवेश्माङ्गणे सान्द्रचन्दनच्छटयोक्षिते । पुष्पोपहारैरागुअदलिमिः कृतरोचिषि ॥ २२३ ॥ सौवर्णकलशः पूर्णैः पुण्यतोयैः सरलकैः । अभ्यषेचि विधानज्ञैर्विधिवत् तद्वधूवरम् ॥२२४॥ तदा महानकध्वानः शङ्खकोलाहलाकुल: । घनाडम्बरमाक्रम्ब जजृम्भे नृपमन्दिरे ॥२२५॥ कल्याणाभिषवे तस्मिन् श्रीमतीवज्रजङ्घयोः । स नान्त वैशिकस्तोषनिर्भर न ननर्त यः ॥२२६॥ वाराङ्गनाः पुरन्ध्यूा पौरवर्गश्च तत्क्षणम् । पुण्यैः पुष्पाक्षतैः शेषां साशिषं तावलम्भयन् ॥ २२७॥ लक्ष्णपट्टदुकूलानि निष्प्रवाणीनि' तौ तदा । क्षीरोदोर्मिमयानीव पर्यधतामनन्तरम् ॥२२८॥ प्रसाधनगृहे रम्ये 'प्राङ्मुखं सुनिवेशितौ । तावलंकारसर्वस्वं भेजतुर्मङ्गकोचितम् ॥ २२९॥ चन्दनेनानुलिप्तौ तौ ललाटेन " ललाटिकाम् । चन्दनद्रवविन्यस्तां दधतुः कौतुकोचिताम् ॥२३०॥ वक्षसा हारयष्टिं तौ हरिचन्दनशोभिना । भवन्तां मौक्तिकैः स्थूलैः धृततारावलिश्रियम् ॥२३१॥ पुष्पमाला बभौ मूर्ध्नि तयोः कुञ्चितमूर्द्धजे । सीतापगेव नीलाद्रिशिखरोपान्तवर्त्तिनी ॥२३२॥ कर्णिकाभरणम्यासं' ३ कर्णयोर्निरविक्षताम्। "यद्रतामीशुभिर्भेजे तद्वक्त्राब्जं परां श्रियम् ॥ २३३॥ १२ 3 १५८ दिन शुभ लग्न और चन्द्रमा तथा ताराओंके बलसे सहित शुभ मुहूर्त आया । उस दिन नगर विशेषरूपसे सजाया गया। चारों ओर तोरण लगाये गये तथा और भी अनेक विभूति प्रकट की गयी जिससे वह स्वर्गलोकके समान शोभायमान होने लगा। राजभवन के आँगनमें सब ओर सघन चन्दन छिड़का गया तथा गुंजार करते हुए भ्रमरोंसे सुशोभित पुष्प सब ओर बिखेरे गये । इन सब कारणोंसे वह राजभवनका आँगन बहुत ही शोभायमान हो रहा था । उस आँगनमें वधू-वर बैठाये गये तथा विधि-विधानके जाननेवाले लोगोंने पवित्र जलसे भरे हुए रत्नजड़ित सुवर्णमय कलशोंसे उनका अभिषेक किया ।। २२१ - २२४॥ उस समय राजमन्दिर में शङ्खके शब्द से मिला हुआ बड़े-बड़े दुन्दुभियोंका भारी कोलाहल हो रहा था और वह आकाशको भी उल्लंघन कर सब ओर फैल गया था ||२२५ || श्रीमती और वज्रजंघके उस विवाहाभिषेक के समय अन्तःपुरका ऐसा कोई मनुष्य नहीं था जो हर्षसे सन्तुष्ट होकर नृत्य न कर रहा हो ||२२६|| उस समय बारांगनाएँ, कुलवधुएँ और समस्त नगर निवासी जन उन दोनों वर-वधुओंको आशीर्वाद के साथ-साथ पवित्र पुष्प और अक्षतोंके द्वारा प्रसाद प्राप्त करा रहे थे ||२२७|| अभिषेकके बाद उन दोनों वर-वधूने क्षीरसागरकी लहरोंके समान अत्यन्त उज्ज्वल, महीन और नवीन रेशमी वस्त्र धारण किये || २२८|| तत्पश्चात् दोनों वर-वधू अतिशय मनोहर प्रसाधन गृहमें जाकर पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके बैठ गये और वहाँ उन्होंने विवाह मंगलके योग्य उत्तम - उत्तम आभूषण धारण किये || २२९ || पहले उन्होंने अपने सारे शरीर में चन्दनका लेप किया । फिर ललाटपर विवाहोत्सवके योग्य, घिसे हुए चन्दनका तिलक लगाया ||२३०|| तदनन्तर सफेद चन्दन अथवा केशर से शोभायमान वक्षःस्थलपर गोल नक्षत्र - मालाके समान सुशोभित बड़े-बड़े मोतियोंके बने हुए हार धारण किये || २३१|| कुटिल केशों से सुशोभित उनके मस्तकपर धारण की हुई पुष्पमाला नीलगिरिके शिखरके समीप बहती हुई सीता नदीके समान शोभायमान हो रही थी ||२३२|| उन दोनोंने कानोंमें ऐसे कर्णभूषण १. प्रोक्षिते । २. आकीर्णः । ३. अन्तःपुरेध्वधिकृतः । ४. आशोः सहिताम् । ५. प्रापयन्ति स्म । ६. नववस्त्राणि । -नि तत्प्रमाणानि स० । ७. परिधानमकाष्टम् । ८. अलंकारगृहे । ९. प्राङ्मुखी स० । १०. तिलकम् । ११. उत्सवोचिताम् । १२. वृत्ततारा- अ०, स० ल० । १३. कर्णाभरणम् । १४. अधत्ताम् । 'निवेशो भूतिभोगयोः' इत्यमरः । १५. यद्रत्नाभ्यंशुभि - प० । यद्रत्नाभांशुभि - अ० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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