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________________ सप्तमं पर्व १५७ विवाहमण्डपारम्भं चक्रवर्तिनिदेशतः' । महास्थपतिरातेने परायमणिकाञ्चनैः ॥२१०॥ चामीकरमयाः स्तम्माः तलकम्ममहोदयः । रत्नोज्ज्वल: श्रियं तेननपा इव नपासनः ॥२११॥ स्फाटिक्यो मितयस्तस्मिन् जनानां प्रतिबिम्बकैः । चित्रिता इव संरेजुः प्रेक्षिणां चित्तरञ्जिकाः ।।२१२।। मणिकुष्टिमभूरस्मिन् नीलरत्नविनिर्मिता । पुष्पोपहारय॑रुचद् चौरिवातततारका ।।२१३॥ मुक्तादामानि लम्बानि तद्गम व्यवस्तराम् । सफेनानि मृणालानि लम्बितानीव कौतुकात् ॥२१४।। पद्मरागमयस्तस्मिन् वेदिबन्धोऽभवत् पृथुः । जनानामिव चिसस्थो रागस्तन्मयतां गतः ॥२१५|| सुधोज्ज्वलानि कूटानि पर्यन्तवत्य रेजिरे । तोषात् सुरविमानानि हसन्तीयारमशोमया ॥२१६॥ वेदिका कटिसूत्रेण पर्यन्ते स परिष्कृतः । रामणीयकसीम्नेव रुददिक्कन विश्वतः ॥२१॥ रस्नैविरचितं तस्य बभौ गोपुरमुच्चकैः । प्रोत्सर्पद्रनमाजालरचितेन्द्रशरासनम् ।।२१८।। सर्वरखमयस्तस्य द्वारबन्धो निवेशितः । लक्ष्याः प्रवेशनायव पर्यन्तार्पितमङ्गलः ॥२१९।। स तदााहिकी पूजां चक्रे चक्रधरः पराम् । कल्पवृक्षमहारूटिं महापूतजिनालये ॥२२॥ ततः शुमदिने सौम्ये लग्ने शुभमुहूर्तके । चन्द्रताराबलोपेते तो : सम्यनिरूपिते ॥२२१॥ राजमहलका तो कहना ही क्या था ? वह तो मानो दूसरी ही शोभाको प्राप्त हो रहा था, उसकी शोभा ही बदल गयी थी॥२०९॥ चक्रवर्तीकी आज्ञासे विश्वकर्मा नामक मनुष्यरत्नने महामूल्य रनों और सुवर्णसे विवाहमण्डप तैयार किया था ॥२१॥ उस विवाहमण्डपमें सुवर्णके खम्भे लगे हुए थे और उनके नीचे रनोंसे शोभायमान बड़े-बड़े तलकुम्भ लगे हुए थे, उन तलकुम्भोंसे वे सुवर्णके खम्भे ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे कि सिंहासनोंसे राजा सुशोभित होते हैं ।।२११॥ उस मण्डपमें स्फटिककी दीवालोंपर अनेक मनुष्योंके प्रतिबिम्ब पड़ते थे जिनसे वे चित्रित हुई-सी जान पड़ती थीं और इसीलिए दर्शकोंका मन अनुरञ्जित कर रही थीं ॥२१२।। उस मण्डपकी भूमि नील रत्नोंसे बनी हुई थी, उसपर जहाँ-तहाँ फूल बिखेरे गये थे। उन फूलोंसे वह ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो ताराओंसे व्याप्त नीला आकाश ही हो ॥२१३।। उस मण्डपके भीतर जो मोतियोंकी मालाएँ लटकती थीं वे ऐसी भली मालूम होती थीं मानो किसीने कौतुकवश फेनसहित मृणाल ही लटका दिये हों ।।२१४॥ उस मण्डपके मध्यमें पद्मराग मणियोंकी एक बड़ो वेदी बनी थी जो ऐसी जान पड़ती थी मानो मनुष्योंके हृदयका अनुराग ही वेदीके आकारमें परिणत हो गया हो।।२१५।। उस मण्डपके पर्यन्त भागमें चूनासे पुते हुए सफेद शिखर ऐसे शोभायमान होते थे मानो अपनी शोभासे सन्तुष्ट होकर देवोंके विमानोंकी हँसी ही उड़ा रहे हों ।।२१६।। उस मण्डपके सब ओर एक छोटी-सी वेदिका बनी हुई थी, वह वेदिका उसके कटिसूत्रके समान जान पड़ती थी। उस वेदिकारूप कटिसूत्रसे घिरा हुआ मण्डप ऐसा मालूम होता था मानोसब ओरसे दिशाओंको रोकनेवाली सौन्दर्यकी सीमासे ही घिरा हो।॥२१७।। अनेक प्रकारके रमोंसे बहुत ऊँचा बना हुआ उसका गोपुर-द्वार ऐसा मालूम होता था मानो रत्नोंको फैलती हुई कान्तिके समूहसे इन्द्रधनुष ही बना रहा हो। २१८॥ उस मण्डपका भीतरी दरवाजा सब प्रकारके रत्नोंसे बनाया गया था और उसके दोनों ओर मजाल-द्रव्य रखे गये थे, जिससे ऐसा जान पडता था मानो लक्ष्मीके प्रवेश किए ही बनाया गया हो ।।२१९॥ उसी समय वनदन्त चक्रवर्तीने महापूत चैत्यालयमें आठ दिन तक कल्पवृक्ष नामक महापूजा की थी॥२२०।। तदनन्तर ज्योतिषियोंके द्वारा बताया हुआ शुभ ... १. शासनात् । २. विश्वकर्मा । ३. आसनीभूतपाषाणः । ४. पश्यताम । ५. तन्मण्डपान्तरे । ६. वेदिकानाम्ना हेमसूत्रत्रयेण । ७. ज्योतिःशास्त्रज्ञः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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