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________________ तृतीयं पर्व कोटीकोव्यो दशैकस्य प्रमा' सागरसंख्यया । शेषस्याप्येवमेवेष्टा तावुभौ कल्प इष्यते ॥१५॥ घोढा स पुनरेकैको मिद्यते स्वमिदात्ममिः । तन्नामान्यनुकीय॑न्ते शृणु राजन् यथाक्रमम् ॥१६॥ द्विरुक्कसुषमाद्यासीत् द्वितीया सुषमा मता । सुषमा दुःषमान्तान्या सुषमान्ता च दुःपमा ॥१७॥ पञ्चमी दुःषमा ज्ञेया सैमा षष्ठ्यतिदुःषमा । भेदा इमेऽवसर्पिण्या उत्सर्पिण्या विपर्थयाः ॥१८॥ समा कालविभागः स्यात् सुदुसावहंगईयोः । सुषमा दुःषमेत्येवमतोऽन्वर्थत्वमेतयोः ॥१९॥ उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यौ कालौ सान्तर्मिंदाविमौ । स्थित्युत्सविसर्पाभ्यां लब्धान्वर्थामिधानको ॥२०॥ कालचक्रपरिभ्रान्त्या षट्समापरिवर्त्तनैः । तावुमौ परिवर्तेते तामिस्रेतरपक्षवत् ॥२१॥ पुराऽस्यामवसर्पिण्या क्षेत्रेऽस्मिन् मरताहवये । मध्यमं खण्डमाश्रित्य ववृधे प्रथमा समा ॥२२॥ सागरोपमकोटीनां कोटी स्याच्चतुराहता । तस्य कालस्य परिमा तदा स्थितिरियं मता ॥२३॥ देवोत्तरकुरुक्ष्मासु या स्थितिः समवस्थिता । सा स्थितिऔरते वर्षे युगारम्भे स्म जायते ॥२४॥ उस व्यवहारकालके दो भेद कहे जाते हैं-१ उत्सर्पिणी और २ अवसर्पिणी। जिसमें मनुष्योंके बल, आयु और शरीरका प्रमाण क्रम-क्रमसे बढ़ता जाये उसे उत्सर्पिणी कहते हैं और जिसमें वे क्रम-क्रमसे घटते जायें उसे अवसर्पिणी कहते हैं ।।१४।। उत्सर्पिणी कालका प्रमाण दस कोड़ाकोड़ी सागर है तथा अवसर्पिणी कालका प्रमाण भी इतना ही है । इन दोनोंको मिलाकर बीस कोड़ाकोड़ी सागरका एक कल्प काल होता है ।।१५।। हे राजन् , इन उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी कालके प्रत्येकके छह-छह भेद होते हैं । अब क्रमपूर्वक उनके नाम कहे जाते हैं सो सुनो ॥१६॥ अवसर्पिणी कालके छह भेद ये हैं-पहला सुषमासुषमा, दूसरा सुषमा, तीसरा सुषमादुःषमा, चौथा दुःषमासुषमा, पाँचवाँ दुःषमा और छठा अतिदुःषमा अथवा दुःषमदुःषमा ये अवसर्पिणीके भेद जानना चाहिए। उत्सर्पिणी कालके भी छह भेद होते हैं जो कि उक्त भेदोंसे विपरीत रूप हैं, जैसे १ दुःषमादुःषमा, २ दुःषमा, ३ दुःषमासुषमा, ४ सुषमादुःषमा, ५ सुषमा और ६ सुषमासुषमा ॥१७-१८॥ समा कालके विभागको कहते हैं तथा सु और दुर् उपसर्ग-क्रमसे अच्छे और बुरे अर्थमें आते हैं। सु और दुर् उपसगोंको पृथक्-पृथक् समाके साथ जोड़ देने तथा व्याकरणके नियमानुसार स को ष कर देनेसे सुषमा तथा दुःषमा शब्दोंकी सिद्धि होती है । जिनका अर्थ क्रमसे अच्छा काल और बुरा काल होता है, इस तरह उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी कालके छहों भेद सार्थक नामवाले हैं ।।१९।।. इसी प्रकार अपने अवान्तर भेदोंसे सहित उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल भी सार्थक नामसे युक्त हैं क्योंकि जिसमें स्थिति आदिकी वृद्धि होती रहे उसे उत्सर्पिणी और जिसमें घटती होती रहे उसे अवसर्पिणी कहते हैं ॥२०॥ ये उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दोनों ही भेद कालचक्रके परिभ्रमणसे अपने छहों कालोंके साथ-साथ कृष्णपक्ष और शुक्लपक्षकी तरह घूमते रहते हैं अर्थात् जिस तरह कृष्णपक्षके बाद शुक्लपक्ष और शुक्लपक्षके बाद कृष्णपक्ष बदलता रहता है उसी तरह अवसर्पिणीके बाद उत्सर्पिणी और उत्सर्पिणीके बाद अवसर्पिणी बदलती रहती है ॥२१॥ पहले इस भरतक्षेत्रके मध्यवर्ती आर्यखण्डमें अवसर्पिणीका पहला भेद सुषमासुषमा नामका काल बीत रहा था उस कालका परिमाण चारं कोड़ाकोड़ी सागर था, उस समय यहाँ नीचे लिखे अनुसार व्यवस्था थो ।२२-२३।। देवकुरु और उत्तरकुरु नामक उत्तर भोगभूगियोंमें जैसी स्थिति रहती है ठीक वैसी ही स्थिति इस भरतक्षेत्रमें युगके १. प्रमितिः । २. कालः । ३. तामिस्रेतरी कृष्णशुक्लौ। ४. प्रथते स०प० । ववृते द०,८० । ववृते वर्तते स्म...
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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