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________________ द्वितीयं पर्व ततो यथाक्रम विष्णुर्नन्दिमित्रोऽपराजितः । गोवर्धनो भद्रबाहुरित्याचार्या महाधियः ॥१४॥ चतुर्दशमहाविद्यास्थानानां पारगा इमे । पुराणं पोतयिष्यन्ति कात्स्न्येन 'शरदः शतम् ॥१४॥ विसाखप्रोष्टिलाचायौं क्षत्रियो जयसाहयः । नागसेनश्च सिदार्थों प्रतिषेणस्तथैव च ॥१४३॥ विजयो बुद्धिमान् गणदेवो धर्मादिशग्दनः । सेनश्व दशपूर्वाणां धारकाः स्युर्यथाक्रमम् ॥१४॥ ज्यशीतिशतमब्दानामेतेषां कालसंग्रहः । तदा च कृत्स्नमवेदं पुराणं विस्तरिष्यते ॥१४५॥ ततो नक्षत्रनामा च जयपालो महातपाः । पाण्डुश्च ध्रुवसेनश्च कंसाचार्य इति क्रमात् ॥१४६॥ एकादशाङ्गविद्यानां पारगाः स्युर्मुनीश्वराः । विशं द्विशतमब्दानामेतेषां काल इष्यते ॥१४॥ तदा पुराणमेतत् तु पादोनं प्रथयिष्यते । माजनामावतो भूयो जायेत ज्ञाकनिष्ठता ॥१४८॥ सुमद्रश्र यशोभद्रो मचाहुमहायशाः । लोहार्यश्चेत्यमी ज्ञेयाः प्रथमाजाब्धिपारगाः ॥१४९॥ "शरदां शतमेषां स्यात् कालोऽष्टादशमिर्युतम् । तुर्यो मागः पुराणस्य तदास्य प्रतनिष्यते ॥१५०॥ ततः क्रमात् प्रहायेदं पुराणं स्वल्पमात्रया। धीप्रमोषादिदोषेण विरलैारयिष्यते ॥१५१॥ ज्ञानविज्ञानसंपनगुरुपर्वान्वयादिदम् । प्रमाणं"यच यावच्च यदा यस प्रकाशते ॥५२॥ तदापीदमनुस्मतुं प्रमविष्यन्ति धीधनाः । जिनसेनाप्रगाः पूज्याः कवीनां परमेश्वराः ॥१५३॥ "पुराणमिदमेवाद्यं यदानातं स्वयम्भुवा । पुराणामासमन्यत्तु केवलं वाङ्मलं विदुः ॥१५४॥ है ॥१४॥ तदनन्तर सौ वर्ष में क्रम-क्रमसे विष्णु, नन्दिमित्र, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु व बुद्धिमान आचार्य होंगे। ये आचार्य ग्यारह अङ्ग और चौदह पूर्वरूप महाविद्याओंके त अर्थात श्रतकेवली होंगे और पुराणको सम्पूर्ण रूपसे प्रकाशित करते रहेंगे॥१४१-१४२।। इनके अनन्तर क्रमसे विशाखाचार्य, प्रोष्ठिलाचार्य, क्षत्रियाचार्य, जयाचार्य, नागसेन, सिद्धार्थ, धृतिषेण, विजय, बुद्धिमान् , गणदेव और धर्मसेन ये ग्यारह आचार्य ग्यारह अङ्ग और दश पूर्वके धारक होंगे । उनका काल १८३ वर्ष होगा। उस समय तक इस पुराणका पूर्ण प्रकाश होता रहेगा ॥१४३-१४५।। इनके बाद क्रमसे नक्षत्र, जयपाल, पाण्डु, ध्रुवसेन और कंसाचार्य ये पाँच महा तपस्वी मुनि होंगे। ये सब ग्यारह अङ्गके धारक होंगे, इनका समय २२० दो सौ बीस वर्ष माना जाता है । उस समय यह पुराण एक भाग कम अर्थात् तीन चतुर्थांश रूपमें प्रकाशित रहेगा फिर योग्य पात्रका अभाव होनेसे भगवानका कहा हुआ यह पुराण अवश्य हो कम होता जायेगा ॥१४६-१४८॥ इनके बाद सुभद्र, यशोभद्र, भद्रबाहु और लोहाचार्य ये चार आचार्य होंगे जो कि विशाल कीर्तिके धारक और प्रथम अंग (आचारांग) रूपी समुद्रके पारगामी होंगे। इन सबका समय अठारह वर्षे होगा। उस समय इस पुराणका एक चौथाई भाग ही प्रचलित रह जायेगा ॥१४९-१५०।। इसके अनन्तर अर्थात् वर्धमान स्वामीके मोक्ष जानेसे ६८३ छह सौ तिरासी वर्ष बाद यह पुराण क्रम-क्रमसे थोड़ा-थोड़ा घटता जायेगा। उस समय लोगोंकी बुद्धि भी कम होती जायेगी इसलिए विरले आचार्य ही इसे अल्परूपमें धारण कर सकेंगे ॥१५१।। इस प्रकार ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न गुरुपरिपाटी-द्वारा यह पुराण जब और जिस मात्रामें प्रकाशित होता रहेगा उसका स्मरण करनेके लिए जिनसेन आदि महाबुद्धिमान पूज्य और श्रेष्ठ कवि उत्पन्न होंगे ॥१५२-१५३॥ श्री वर्धमान स्वामीने जिसका निरूपण किया १. संवत्सरस्य । २. शब्दतः म०, ५०, म०, द०, ल० । शब्दितः स० । ३. यशीतं शत-अ०, स०, ५०, म०, द०, ल०। ४. -मेतच्च अ० । ५. पश्चात् । ६. जायेताज्ञा-ल० । ७. समानां अ०, ब०, ५०, म०, ल०, द०, स० । ८. -युतः अ०, द०, म०, ५०, स० । ९. प्रहोणं भूत्वा। १०. ज्ञानं [ मतिज्ञानं ] विज्ञानं [लिखितपठितादिकं श्रुतज्ञानम् ] । ११. यत्र द०, प० । १२. समर्था भविष्यन्ति । १३. प्रमाणमिद-अ०, स०, ५०, द०, म०, ल० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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