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________________ x आदिपुराणम् तीर्थकर्तृपुराणेषु शेषाणामपि संग्रहात् । चतुर्विशतिरेवान पुराणानीति केचन ॥१२७॥ पुराणं वृषमस्यायं द्वितीयमजितेशिनः । तृतीयं संभवस्येष्टं चतुर्थमभिनन्दने ॥१२८॥ पञ्चमं सुमतेः प्रोक्तं षष्ठं पाप्रमस्य च । सप्तमं स्यात्सुपार्श्वस्य 'चन्द्रमासोऽष्टमं स्मृतम् ॥१२९॥ नवमं पुष्पदन्तस्य दशमं शीतलेशिनः । श्रायसं च परं तस्माद द्वादशं वासुपूज्यगम् ॥१३०॥ प्रयोदशं च विमले ततोऽनन्तजितः परम् । जिने पञ्चदशं धर्म शान्तेः षोडशमीशितुः ॥१३॥ कुन्थोः सप्तदशं ज्ञेयमरस्याष्टादशं मतम् । मल्लेरेकोनविंशं स्याद् विंशं च मुनिसुव्रते ॥१३२॥ एकविंशं नमर्मर्तु मेविंशमर्हतः । पार्श्वेशस्य त्रयोविंशं चतुर्विशं च सन्मते ॥३३॥ पुराणान्येवमेतानि चतुर्विशतिरहताम् । महापुराणमेतेषां समूहः परिभाष्यते ॥१३४।। पुराणं महदद्यत्वे यदस्माभिरनुस्मृतम् । पुरा युगान्ते तन्नूनं कियदप्यवशिष्यते ॥१३५॥ दोषाद् दुःषमकालस्य प्रहास्यन्ते धियो नृणाम् । तासां हानेः पुराणस्य हीयते ग्रन्थविस्तरः ॥१३६॥ तथाहीदं पुराणं नः 'सधर्मा श्रुतकेवली । सुधर्मः प्रचयं नेष्यत्यखिलं मदनन्तरम् ॥१३७॥ जम्बूनामा ततः कृत्स्नं पुराणमपि शुश्रुवान् । प्रथयिष्यति लोकेऽस्मिन् सोऽन्त्यः केवलिनामिह ॥१३८॥ अहं सुधर्मो जम्वाख्यो निखिलश्रुतधारिणः । क्रमात् कैवल्यमुत्पाद्य निर्वास्यामस्ततो वयम् ॥१३९॥ प्रयाणामस्मदादीनो कालः केवलिनामिह । द्वापष्टिवर्षपिण्डः स्याद् भगवनिर्वृतेः परम् ॥१४०॥ व अवयव अवश्य हैं परन्तु इसके अवान्तर अधिकारोंका विस्तार अमर्यादित है ॥१२६॥ कोई-कोई आचार्य ऐसा भी कहते हैं कि तीर्थकरोंके पुराणोंमें चक्रवर्ती आदिके पुराणोंका भी संग्रह हो जाता है इसलिए चौबीस हो पुराण समझना चाहिए। जो कि इस प्रकार हैंपहला पुराण घृषभनाथका, दूसरा अजितनाथका, तीसरा संभवनाथका, चौथा अभिनन्दननाथका, पाँचवाँ सुमतिनाथका, छठा पनप्रभका, सातवाँ सुपार्श्वनाथका, आठवाँ चन्द्रप्रभका, नौवाँ पुष्पदन्तका, दसवाँ शीतलनाथका, ग्यारहवाँ श्रेयान्सनाथका, बारहवाँ वासुपूज्यका, तेरहवाँ विमलनाथका, चौदहवाँ अनन्तनाथका, पन्द्रहवाँ धर्मनाथका, सोलहवाँ शान्तिनाथका, सत्रहवाँ कुन्थुनाथका, अठारहवाँ अरनाथका, उन्नीसवाँ मल्लिनाथका, बीसवाँ मुनिसुव्रतनाथका, इक्कीसवाँ नमिनाथका, बाईसवाँ नेमिनाथका, तेईसवाँ पार्श्वनाथका और चौबीसवाँ सन्मति-महावीर स्वामीका ॥१२७-१३३।। इस प्रकार चौबीस तीर्थकरोंके ये चौबीस पुराण हैं इनका जो समूह है वही महापुराण कहलाता है !!१३४।। आज मैंने जिस महापुराणका वर्णन किया है वह इस अवसर्पिणी युगके अन्तमें निश्चयसे बहुत ही अल्प रह जायेगा ॥१३५॥ क्योंकि दुःषम नामक पाँचवें कालके दोषसे मनुष्योंकी बुद्धियाँ उत्तरोत्तर घटती जायेंगी और बुद्धियोंके घटनेसे पुराणके ग्रन्थका विस्तार भी घट जायेगा ।।१३६।। उसका स्पष्ट निरूपण इस प्रकार समझना चाहिए-हमारे पीछे श्रुतकेवली सुधर्माचार्य जो कि हमारे ही समान हैं, इस महापुराणको पूर्णरूपसे प्रकाशित करेंगे ॥१३७॥ उनसे यह सम्पूर्ण पुराण श्री जम्बूस्वामी सुनेंगे और वे अन्तिम केवली होकर इस लोकमें उसका पूर्ण प्रकाश करेंगे ॥१३८॥ इस समय मैं, सुधर्माचाये और जम्बूस्वामी तीनों ही पूर्ण श्रुतज्ञानको धारण करनेवाले हैं-श्रुत केवली हैं । हम तीनों क्रम-क्रमसे केवलज्ञान प्राप्त कर मुक्त हो जायेंगे ॥१३९।। हम तीनों केवलियोंका काल भगवान् वर्धमान स्वामीकी मुक्तिके बाद बासठ वर्षका १. चन्दप्रभस्य । २. श्रेयस इदम् । श्रेयांसं अ०, ५०, ल०। ३. महदाद्यत्वे अ०, ५०, स०, ल.। ४. कथितम् । ५. अग्रे । ६. सुधर्मा अ०, ५०। ७. सुधर्मप्र-१०। ८. निर्वति गमिष्यामः । ९. भगवन्न तेः ल०।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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