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________________ द्वितीयं पर्व ४१ दन्यप्रमाणमित्युकं भावतस्तु 'श्रुनायम् । प्रमाणमविसंवादि परमषिप्रणेतृकम् ॥११॥ पुराणस्यास्य वक्तव्यं कृत्स्नं वाङ्मयमिष्यते । यता नास्माद् बहिर्भूतमस्ति वस्तु वचोऽपि वा॥११५॥ यथा महायरत्नानां प्रसूतिर्मकराकरात् । तथैव सूक्तरत्नानां प्रभवोऽस्मात् पुराणतः ॥११६॥ तीर्थकृच्चक्रवर्तीन्द्रबलकेशवसंपदः। मुनीनामृद्धयश्चास्य वनव्याः सह कारणैः ॥११७॥ बद्धो मुक्तस्तथा बन्धो मोक्षस्तद्वयकारणम् । षड्द्रग्याणि पदार्थाश्च नवेत्यस्यार्थसंग्रहः ॥११८॥ जगत्त्रयनिवेशश्च त्रैकाल्यस्य च संग्रहः । जगतः सृष्टिसंहारौ चेति कृत्स्नमिहोद्यते ॥११९॥ मार्गों मार्गफलं चेति पुरुषार्थसमुच्चयः । यावान् प्रविस्तरस्तस्य धत्ते सोऽस्याभिधेयताम् ॥१२॥ किमत्र बहुनोक्तेन धर्मसृष्टिरविप्लुता । यावतो सास्य वक्तव्यपदवीमवगाहते ॥१२॥ सुदुर्लभं यदन्यत्र चिरादपि सुभाषितम् । सुलभं स्वैरसंग्राह्यं तदिहास्ति पदे पदे ।।१२२।। यदत्र सुस्थितं वस्तु तदेव निकषक्षमम् । यदव दुःस्थितं नाम तत्सर्वत्रैव दुःस्थितम् ॥१२३॥ एवं महाभिधेयस्य पुराणस्यास्य भूयसः । क्रियतेऽर्थाधिकाराणामियत्तानुगमोऽधुना ॥१२४॥ त्रयः षष्टिरिहार्थाधिकाराः प्रोक्का महर्षिभिः । कथाषुरुषसंख्यायास्तत्प्रमाणानतिक्रमात् ॥१२५॥ त्रिषष्ट्यवयवः सोऽयं पुराणस्कन्ध इष्यते । अवान्तराधिकाराणामपर्यन्तोऽत्र विस्तरः ॥१२६॥ है॥१११-११३।। यह जो ऊपर प्रमाण बतलाया है सो द्रव्यश्रुतका ही है, भावश्रुतका नहीं है। वह भावकी अपेक्षा श्रुतज्ञान रूप है जो कि सत्यार्थ, विरोधरहित और केवलिप्रणीत है ॥११४।। सम्पूर्ण द्वादशाङ्ग ही इस पुराणका अभिधेय विषय है क्योंकि इसके बाहर न तो कोई विषय ही है और न शब्द ही है ॥११५।। जिस प्रकार महामूल्य रत्नोंकी उत्पत्ति समुद्रसे होती है उसी प्रकार सुभाषितरूपी रत्नोंकी उत्पत्ति इस पुराणसे होती है ॥११६।। इस पुराणमें तीर्थकर, चक्रवर्ती, इन्, बलभद्र और नारायणोंकी सम्पदाओं तथा मुनियोंकी ऋद्धियोंका उनकी प्राप्तिके कारणोंके साथ-साथ वर्णन किया जायेगा ॥११७। इसी प्रकार संसारी जीव, मुक्त जीव, बन्ध, मोक्ष, इन दोनोंके कारण, छह द्रव्य और नव पदार्थ ये सब इस प्रन्थके अर्थसंग्रह हैं अर्थात् इस सबका इसमें वर्णन किया जायेगा ॥११८।। इस पुराणमें तीनों लोकोंकी रचना, तीनों कालोंका संग्रह, संसारको उत्पत्ति और विनाश इन सबका वर्णन किया जायेगा ॥ ११९ ॥ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप मार्ग, मोक्ष रूप इसका फल तथा धर्म, अर्थ और काम ये पुरुषार्थ इन सबका जो कुछ विस्तार है वह सब इस ग्रन्थको अभिधेयताको धारण करता है अर्थात् उसका इसमें कथन किया जायेगा ॥१२०।। अधिक कहनेसे क्या, जो कुछ जितनी निर्बाध धर्मको सृष्टि है वह सब इस ग्रन्थकी वर्णनीय वस्तु है ॥१२१।। जो सुभाषित दूसरी जगह बहुत समय तक खोजनेपर भी नहीं मिल सकते उनका संग्रह इस पुराणमें अपनी इच्छानुसार पद-पदपर किया जा सकता है ।।१२२।। इस प्रन्थमें जो पदार्थ उत्तम ठहराया गया है वह दूसरी जगह भी उत्तम होगा तथा जो इस प्रन्थमें बुरा ठहराया गया है वह सभी जगह बुरा ही ठहराया जायेगा। भावार्थ-यह ग्रन्थ पदार्थोकी अच्छाई तथा बुराईकी परीक्षा करनेके लिए कसौटीके समान है ।।१२३।। इस प्रकार यह महापुराण बहुत भारी विषयोंका निरूपण करनेवाला है। अब इसके अर्थाधिकारोंकी संख्याका नियम कहते हैं ॥१२४॥ इस ग्रन्थमें तिरसठ महापुरुषोंका वर्णन किया जायेगा इसलिए उसी संख्याके अनुसार ऋषियोंने इसके तिरसठ ही अधिकार कहे हैं ॥१२५।। इस पुराण स्कन्धके तिरसठ अधिकार १. श्रुतज्ञानं (नामा)। २. अभिधेयम् । ३. अर्थः । ४. -मिहोच्यते द०, ५०, स०, म०, ल० । ५. रत्नत्रयात्मकः । ६. अबाधिता । ७. विचारक्षमम् । ८. -त्ताधिगमो-अ०, द० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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