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________________ आदिपुराणम् प्रकृतस्यार्थतत्त्वस्य श्रोतृबुद्धौ समर्पणम् । उपक्रमोऽसौ विज्ञेयस्तथोपोद्धात इत्यपि ॥१०॥ आनुपूर्वी तथा नाम प्रमाणं साभिधेयकम् । अर्थाधिकारश्चेत्येवं पञ्चैते स्युरुपक्रमाः ॥१०॥ 'पूर्वानुपूर्ध्या प्रथमश्चरमोऽयं विलोमतः । यथातथानुपूर्व्या च यां कांचिद्गणनां श्रितः ॥१०॥ श्रुतस्कन्धानुयोगानां चतुर्णा प्रथमो मतः । ततोऽनुयोगं प्रथमं प्राहुरन्वर्थसंज्ञया ॥१०॥ प्रमाणमधुना तस्य वक्ष्यते ग्रन्थतोऽर्थतः । ग्रन्थगौरवभीरूणां श्रोत णामनुरोधतः ।।१०७।। सोऽर्थतोऽपरिमेयोऽपि संख्येयः शब्दतो मतः । कृत्स्नस्य वाङमयस्यास्य संख्येयत्वानतिक्रमात् ॥१८॥ द्वे लक्षे पञ्चपञ्चाशत्सहस्राणि चतुःशतम् । चत्वारिंशत्तथा द्वे च कोव्योऽस्मिन् अन्यसंख्यया ॥१०९।। एकत्रिंशच्च लक्षाः स्युः शतानां पञ्चसप्ततिः । ग्रन्थसंख्या च विज्ञेया श्लोकेनानुष्टुभेन हि ॥११॥ प्रन्थप्रमाणनिश्चित्यै पदसंख्योपवर्ण्यते । पञ्चैवेह सहस्राणि पदानां गणना मता ॥११॥ शतानि षोडशैव स्युश्चतुस्त्रिंशच्च कोटयः । व्यशीतिलक्षाः सप्तैव सहस्राणि शताष्टकम् ।।११२॥ अष्टाशीतिश्च वर्णाः स्युः संहिता मध्यमं पदम् । पदेनतेन मीयन्ते पूर्वाङ्गअन्यविस्तराः ॥११३॥ इस पुराणके प्रारम्भमें उन उपक्रमोंका शास्त्रानुसार सम्बन्ध लगा लेना चाहिए ॥१०२।। प्रकृत अर्थात् जिसका वर्णन करनेकी इच्छा है ऐसे पदार्थको श्रोताओंकी बुद्धिमें बैठा देना-उन्हें अच्छी तरह समझा देना सो उपक्रम है इसका दूसरा नाम उपोद्धात भी है ॥१०३।। १ आनुपूर्वी, २ नाम, ३ प्रमाण, ४ अभिधेय और ५ अर्थाधिकार ये उपक्रमके पाँच भेद हैं ॥१०४॥ यदि चारों महाधिकारोंको पूर्व क्रमसे गिना जाये तो प्रथमानुयोग पहला अनुयोग होता है और यदि उलटे क्रमसे गिना जाये तो यही प्रथमानुयोग अन्तका अनुयोग होता है। अपनी इच्छानुसार जहाँ कहींसे भी गणना करनेपर यह दूसरा तीसरा आदि किसी भी संख्याका हो सकता है ।।१०५।। ग्रन्थके नाम कहनेको नाम उपक्रम कहते है यह प्रथमानुयोग श्रुतस्कन्धके चारों अनुयोगोंमें सबसे पहला है इसलिए इसका प्रथमानुयोग यह नाम सार्थक गिना जाता है ॥१०६।। ग्रन्थ-विस्तारके भयसे डरनेवाले श्रोताओंके अनुरोधसे अब इस ग्रन्थका प्रमाण बतलाता हूँ। वह प्रमाण अक्षरों की संख्या तथा अर्थ इन दोनोंकी अपेक्षा बतलाया जायेगा॥१०७॥ यद्यपि यह प्रथमानुयोग रूप ग्रन्थ अर्थकी अपेक्षा अपरिमेय है-संख्यासे रहित है तथापि शब्दोंकी अपेक्षा परिमेय है-संख्येय है तब उसका एक अंश प्रथमानुयोग असंख्येय कैसे हो सकता है ? ॥१०८।। ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् श्लोकोंके द्वारा गणना करनेपर प्रथमानुयोगमें दो लाख करोड़, पचपन हजार करोड़, चार सौ बयालीस करोड़ और इकतीस लाख सात हजार पाँच सौ ( २५५४४२३१०७५०० ) श्लोक होते हैं ॥१०९-११०।। इस प्रकार ग्रन्थप्रमाणका निश्चय कर अब उसके पदोंकी संख्याका वर्णन करते हैं। प्रथमानुयोग ग्रन्थके पदोंकी गणना पाँच हजार मानी गयी है और सोलह सौ चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अठासी (१६३४८३०७८८८) अक्षरोंका एक मध्यम पद होता है। इस मध्यमपदके द्वारा ही ग्यारह अङ्ग तथा चौदह पूर्वोकी ग्रन्थसंख्याका वर्णन किया जाता १. पूर्वपरिपाट्या । २. अपरतः, अपरानुपूर्दीत्यर्थः । ३.-ञ्चिद्गुणनां स०। ४. प्रथमानुयोगस्य । ५. परिकर्मादिभेदेन पञ्चविधस्य द्वादशतमाङ्गस्य दृष्टिवादास्यस्य तृतीयो भेदः प्रथमानुयोगः। तत्र पञ्चसहस्रमध्यमपदानि भवन्ति तानि मध्यमपदवणेः १६३४८३०७८८८ गुणयित्वा द्वात्रिंशत्संख्यया भक्ते । लक्षे पञ्च. पञ्चाशदित्यादिसंख्या स्यात् । ६. प्रमाणं निश्चित्य द०, ५०, ल. । ७. गणिमानतः ८०। गणधरतः। ८. संहताः ट० । संयुक्ताः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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