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________________ ४४ आदिपुराणम् नामग्रहणमात्रं च पुनाति परमेष्टिनाम् । किं पुनर्मुहुरापीतं तत्कथाश्रवणामृतम् ॥१५५॥ ततो मध्यजनैः 'श्राद्धैरवगाह्यमिदं मुहुः । पुराणं पुण्य पुंरत्नैर्भूतमन्धीयितं महत् ॥ १५६ ॥ तच्च पूर्वानुपूर्येदं पुराणमनुवर्ण्यते । तत्राथस्य पुराणस्य संग्रह कारिका विदुः || १५७॥ स्थितिः कुळधरोत्पत्तिर्वंशानामथ निर्गमः । पुरोः साम्राज्यमार्हन्त्यं निर्वाणं युगविच्छिदां ॥ १५८ ॥ एते महाधिकाराः स्युः पुराणे वृषभेशिनः । यथावसरमन्येषु पुराणेष्वपि लक्षयेत् ॥ १५९ ॥ कथोपोद्धात एष स्यात् कथायाः पीठिकामितः । वक्ष्ये कालावतारं च स्थितीः कुलभृतामपि ॥ १६० ॥ मालिनीच्छन्दः प्रणिगदति सतोत्थं गौतमं भक्तिनम्रा मुनिपरिषदशेषा श्रोतुकामा पुराणम् । मगधनृपतिनार्मा सावधाना तदाभूद्धितमवगर्णयेद् वाकः सुधीराप्तवाक्यम् ॥१६१॥ १० शार्दूलविक्रीडितम् इत्याचार्य परम्परीणममलं पुण्यं पुराणं पुरा कल्पे यद्भगवानुवाच वृषभश्चक्रादिभत्रे जिनः । तद्वः पापकलङ्कपङ्कमखिलं प्रक्षाल्य शुद्धिं परां देयात् पुण्यवचोजलं परमिदं तीर्थं जगत्पावनम् ॥ १६२॥ इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसं हे कथामुखवर्णनं नाम द्वितीयं पर्व ॥२॥ है वह पुराण ही श्रेष्ठ और प्रामाणिक है इसके सिवाय और सब पुराण पुराणाभास हैं उन्हें केवल वाणीके दोषमात्र जानना चाहिए || १५४ || जब कि पचपरमेष्ठियोंका नाम लेना ही जीवोंको पवित्र कर देता है तब बार-बार उनकी कथारूप अमृत का पान करना तो कहना ही क्या है ? वह तो अवश्य ही जीवोंको पवित्र कर देता है-कर्ममलसे रहित कर देता है || १५५ || जब यह बात है तो श्रद्धालु भव्य जीवोंको पुण्यरूपी रत्नोंसे भरे हुए इस पुराणरूपी ' समुद्र में अवश्य ही अवगाहन करना चाहिए || १५६ || ऊपर जिस पुराणका लक्षण कहा है अब यहाँ क्रमसे उसीको कहेंगे और उसमें भी सबसे पहले भगवान् वृषभनाथ के पुराणकी कारिका कहेंगे ||१५७|| श्री वृषभनाथके पुराण में कालका वर्णन, कुलकरोंको उत्पत्ति, वंशोंका निकलना, भगवान्का साम्राज्य, अरहन्त अवस्था, निर्वाण और युगका विच्छेद होना ये महाधिकार हैं । अन्य पुराणोंमें जो अधिकार होंगे वे समयानुसार बताये जायेंगे || १५८ - १५९ ।। इस कथा उपोद्घात है, अब आगे इस कथाकी पीठिका, कालावतार और कुलकरोंकी स्थिति कहेंगे ।।१६०|| इस प्रकार गौतम स्वामीके कहनेपर भक्तिसे नम्र हुई वह मुनियोंकी समस्त सभा पुराण सुनने की इच्छासे श्रेणिक महाराजके साथ सावधान हो गयी, सो ठीक ही है क्योंकि ऐसा कौन बुद्धिमान होगा जो कि आप्त पुरुषोंके हितकारी वचनोंका अनादर करे ||१६१|| इस प्रकार जो आचार्य-परम्परासे प्राप्त हुआ है, निर्दोष है, पुण्यरूप है और युग आदिमें भरत चक्रवर्ती के लिए भगवान् वृषभदेवके द्वारा कहा गया था, ऐसा यह जगत्को पवित्र करनेवाला उत्कृष्ट तीर्थस्वरूप पुराणरूपी पवित्र जल तुम लोगोंके समस्त पाप कलंकरूपी कीचड़को धोकर तुम्हें परम शुद्धि प्रदान करे || १६२ || इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीभगवज्जिनसेनाचार्य विरचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराण के संग्रहमें ‘कथामुखवर्णन' नामक द्वितीय पर्व समाप्त हुआ ॥ २ ॥ १. श्रद्धानयुक्तः । २. पुण्यसंरत्न - अ० । ३. कारिकां ब०, अ०, ल० । ४. उत्पत्तिः । ५. विच्छिदा भेदः । ६. एषोऽस्याः प०, म०, ६०, ल० । ७. स्थिति स०, प०, ६०, म०, ल० । ८. अमा सह । ९. अवज्ञां कुर्यात् । १०. तथाहि । ११. परम्परागतम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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