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________________ आदिपुराणम् ततः स्वायंभुवीं वाणीमवधार्थतः कृती। जगद्विताय सोऽग्रन्थीत्तरपुराणं गणाग्रणीः ॥१९॥ शेषैरपि तथा तीर्थकृनिर्गणधरैरपि । 'महर्दि मिर्यथाम्नायं तत्पुराणं प्रकाशितम् ॥१९५॥ ततो युगान्ते भगवान् वीरः सिद्धार्थनन्दनः । विपुलाद्रिमलंकुर्वन्नेकदास्ताखिलार्थदृक् ॥१९॥ अथोपसृत्य तत्रेनं पश्चिमं तीर्थनायकम् । पप्रच्छामुं पुराणार्थ श्रेणिको विनयानतः ॥१९७॥ तं प्रत्यनुग्रहं भर्तरवबुध्य गणाधिपः । पुराणसंग्रहं कृत्स्नमन्ववोचत् स गौतमः ॥१९॥ 'तत्तदानुस्मृतं तन्त्र गौतमेन महर्षिणा । ततोऽबोधि सुधर्मोऽसौ जम्बूनाम्ने समर्पयत् ॥१९९।। ततः प्रभृत्यविच्छिन्नगुरुपर्वक्रमागतम् । पुराणमधुनास्माभिर्यथाशक्ति प्रकाश्यते ॥२०॥ तत्रोऽत्र मूलतन्त्रस्य कर्ता पश्चिमतीर्थकृत् । गौतमश्चानुतन्त्रस्य प्रत्यासत्तिक्रमाश्रयात् ॥२०॥ श्रेणिकप्रश्नमुद्दिश्य गौतमः प्रत्यभाषत । इतीदमनुसंधाय प्रबन्धोऽयं निबध्यते ॥२०२॥ इतीदं प्रमुख नाम कथासंबन्धसूचनम् । कथाप्रामाण्यसंसिद्धानुपयोगीति वर्णितम् ॥२०३॥ पुराणमृषिमिः प्रोक्तं प्रमाणं सूक्तमाम्जसम् । ततः श्रद्धेयमध्येयं ध्येयं श्रेयोऽर्थिनामिदम् ॥२०॥ इदं पुण्यमिदं पूतमिदं "मङ्गलमुत्तमम् ।" इदमायुष्यमध्यं च यशस्यं स्वर्ग्यमेव च ।।२०५॥ अन्तमें जो पूर्वकालीन इतिहास कहा था, वृषभसेन गणधरने उसे अर्थरूपसे अध्ययन किया ॥१९३।। तदनन्तर गणधरोंमें प्रधान वृषभसेन गणधरने भगवानकी वाणीको अर्थरूपसे हृदयमें धारण कर जगत्के हितके लिए उसकी पुराणरूपसे रचना को ॥१९४॥ वही पुराण अजितनाथ आदि शेष तीर्थकरों, गणधरों तथा बड़े-बड़े ऋषियों द्वारा प्रकाशित किया गया ॥१९५।। तदनन्तर चतुर्थ कालके अन्तमें एक समय सिद्धार्थ राजाके पुत्र सर्वज्ञ महावीर स्वामी विहार करते हुए राजगृहोके विपुलाचल पर्वतपर आकर विराजमान हुए ॥१९६।। इसके बाद पता चलनेपर राजगृहीके अधिपति विनयवान् श्रेणिक महाराजने जाकर उन अन्तिम तीर्थकरभगवान् महावीरसे उस पुराणको पूछा ॥१९७॥ महाराज श्रेणिकके प्रति महावीर स्वामोके अनुग्रहका विचार कर गौतम गणधरने उस समस्त पुराणका वर्णन किया ॥१९८॥ गौतम स्वामी चिरकाल तक उसका स्मरण-चिन्तवन करते रहे, बादमें उन्होंने उसे सुधर्माचार्यसे कहा और सुधर्माचार्यने जम्बूस्वामीसे कहा ।।१९९।। उसी समयसे लेकर आज तक यह पुराण बीचमें नष्ट नहीं होनेवाली गुरुपरम्पराके क्रमसे चला आ रहा है। इसी पुराणका मैं भी इस समय शक्तिके अनुसार प्रकाश करूँगा ।।२००। इस कथनसे यह सिद्ध होता है कि इस पुराणके मूलकतो अन्तिम तीर्थकर भगवान् महावीर है और निकट क्रमकी अपेक्षा उत्तर ग्रन्थकर्ता गौतम गणधर हैं ।।२०१॥ महाराज श्रेणिकके प्रश्नको उद्देश्य करके गौतम स्वामीने जो उत्तर दिया था उसीका अनुसंधान-विचार कर मैं इस पुराण ग्रन्थकी रचना करता हूँ ॥२०२॥ यह प्रतिमुख नामका प्रकरण कथाके सम्बन्धको सूचित करनेवाला है तथा कथाकी प्रामाणिकता सिद्ध करनेके लिए उपयोगी है अतः मैंने यहाँ उसका वर्णन किया है ॥२०॥ यह पुराण ऋषियोंके द्वारा कहा गया है इसलिए निश्चयसे प्रमाणभूत है। अतएव आत्मकल्याण चाहनेवालोंको इसका श्रद्धान, अध्ययन और ध्यान करना चाहिए ।।२०४॥ यह पुराण पुण्य बढ़ानेवाला है, पवित्र है, उत्तम मङ्गलरूप है, आयु बढ़ानेवाला है, श्रेष्ठ है, यश बढ़ानेवाला १. महर्षिभि-म०, ल० । २. प्रोक्तम् । ३. समवसरणे । ४. प्रत्यासत्तिः संबन्धः । ५. अवधार्य ६. पुराणम् । ७. इदं प्रतिमुखं अ०,५०, स०, द०, म०, ल०। ८. इदं प्रमुखम् एतदादि । ९. सूक्तमञ्जसा ६०, म०, ५०, ल० । १०. माङ्गल्य--अ०, १०, स०, द., म. ल.। ११. आयुःकरम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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