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________________ प्रथमं पर्व इति विज्ञापितस्तेन भगवानादितीर्थकृत् । व्याजहार पुराणार्थमतिगम्भीरया गिरा ॥१८॥ अपरिस्पन्दताल्वादेरस्पष्टदशनयुतेः। स्वयंभुवो मुखाम्भोजाजाता चित्रं सरस्वती ॥१८॥ प्रसवागारमेतस्याः सत्यं तद्वक्त्रपजम् । तत्र लब्धारमलामा सायजगहशमानयत् ।।१८५॥ विवक्षया विनैवास्य दिग्यो वाक्प्रसरोऽभवत् । महतां चेष्टितं चित्रं जगदम्युजिहोर्षताम् ॥१८॥ एकरूपापि तमाषा भोलून प्राप्य पृथविधान् । भेजे नानारमतां कुख्याजलनुतिरिवान्निपान् ॥१८॥ परार्थ स कृतार्थोऽपि यदैहिष्ट जगद्गुरुः । तन्नूनं महतां चेष्टा पराथैव निसर्गत: nccn स्वन्मुखात् प्रसूता वाणी दिग्या तां महती समाम् । प्रीणयामास सौधीव धारा संतापहारिणी ॥१८९॥ यस्पृष्टमादितस्तेन तत् सर्वमनुपूर्वशः । वाचस्पतिरनायासाद् भरतं प्रत्ययुषत् ॥१०॥ प्रोगेवोत्सर्पिणीकालसंबन्धि पुरुषाश्रयम्। पुराणमतिगम्भीरं व्याजहार जगद्गुरुः ॥१९॥ ततोऽवसर्पिणीकालमाश्रित्य प्रस्तुतां कथाम् । प्रस्तोऽयन् स पुराणस्य पीठिका प्राक्समादधे ॥१९॥ "इतिवृत्तं पुराकट्ये यत्प्रोवाच 'गिरांपतिः । गणी वृषमसेनाल्यस्तत्तदाधि जगेऽर्थत: १९३॥ इस प्रकार महाराज भरतके द्वारा प्रार्थना किये गये आदिनाथ भगवान सातिशय गम्भीर वाणीसे पुराणका अर्थ कहने लगे ॥ १८३॥ उस समय भगवान्के मुखसे जो वाणी निकल रही थी वह बड़ा ही आश्चर्य करनेवाली थी क्योंकि उसके निकलते समय न तो तालु, कण्ठ, ओठ, आदि अवयव ही हिलते थे और न दाँतोंकी फिरण ही प्रकट हो रही थी ॥ १८४॥ अथवा सचमुच में भगवानका मुखकमळ ही इस सरस्वतीका उत्पत्तिस्थान था उसने वहाँ उत्पन होकर ही जगत्को वश में किया ॥ १८५ ॥ भगवान्के मुखसे जो दिव्य ध्वनि प्रकट हो रही थी वह बोलनेकी इच्छाके बिना ही प्रकट हो रही थी सो ठीक है क्योंकि जगत्का उद्धार चाहनेवाले महापुरुषोंकी चेष्टाएँ आश्चर्य करनेवाली ही होती हैं ॥ १८६ ॥ जिस प्रकार नहरोंके जलका प्रवाह एकरूप होनेपर भी प्रकारके वृक्षोंको पाकर अनेकरूप हो जाता है उसी प्रकार जिनेन्द्रदेवकी वाणी एकरूप होनेपर भी पृथक्-पृथक् श्रोताओंको प्राप्तकर अनेकरूप हो जाती है। भावार्थभगवान्की दिव्य ध्वनि उद्गम स्थानसे एकरूप ही प्रकट होती है परन्तु उसमें सर्वभाषारूप परिणमन होनेका अतिशय होता है जिससे सब श्रोता लोग उसे अपनी-अपनी भाषामें समझ जाते हैं ॥१८७। वे जगद्गुरु भगवान् स्वयं कृतकृत्य होकर भी धर्मोपदेशके द्वारा दूसरोंकी भलाईके लिए उद्योग करते थे। इससे निश्चय होता है कि महापुरुषोंकी चेष्टाएँ स्वभावसे ही परोपकारके लिए होती हैं ।।१८८। उनके मुखसे प्रकट हुई दिव्यवाणीने उस विशाल सभाको अमृतकी धाराके समान सन्तुष्ट किया था क्योंकि अमृतधाराके समान ही उनकी वाणी भव्य जीवोंका सन्ताप दूर करनेवाली थी, जन्म-मरणके दुःखसे छुड़ानेवाली थी॥१८९।। महाराज भरतने पहले जो कुछ पूछा था उस सबको भगवान् वृषभदेव बिना किसी कष्टके क्रमपूर्वक कहने लगे ॥१९०।। जगद्गुरु भगवान् वृषभदेवने सबसे पहले उत्सर्पिणीकाल सम्बन्धी तिरेसठ शलाकापुरुषोंका चरित्र निरूपण करनेवाले अत्यन्त गम्भीर पुराणका निरूपण किया, फिर अवसर्पिणीकालका आश्रय कर तत्सम्बन्धी तिरेसठ शलाकापुरुषोंकी कथा कहनेको इच्छासे पीठिकासहित उनके पुराणका वर्णन किया ॥१९१-१९२॥ भगवान् वृषभनाथने तृतीय कालके १. यत् कारणात् । २. मानयेत् ८०, स० । ३. अभ्यवर्तुमिच्छताम् । ४. 'पयःप्रणालोसरितोः कुल्या' । ५. पेटयामास । ६. अनुक्रमेण । ७. पुरुषाश्रितम् । ८. प्रकृताम् । ९. प्रवक्ष्यन् । १०. माददे प०,९०, स.। ११. ऐतिहम् । १२. सर्वशः। १३. तदाधिजगदेऽषतः स.। १४. ज्ञातवान् । इङ्ग अध्ययने । 'गाकिटि'डो लिटि गाड् भवति इति गालादेशः। १५. गन्धरचनां विना ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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