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________________ प्रथमं पर्व २७ इदमर्चयतां शान्तिस्तुष्टिः पुष्टिश्च पृच्छताम् । पठतां ममारोग्यं शृण्वत्र कर्मनिर्जरा ॥२०६॥ इतो दुःस्वप्ननिर्णाशः 'सुस्वप्नस्फातिरेव च। इतोऽभीष्टफलव्यक्तिर्निमित्तमभिपश्यताम् ॥२०७॥ हरिणीच्छन्दः 'वृषमकविमिर्यातं मार्गः वयं च किलाधुना ब्रजितुमनसो हास्यं लोके किमन्यदतः परम् । घटितमथवा नैतचित्रं पतत्पतिलङ्कितं' गगनमितरे नाक्रामेयुः किमल्पशकुन्तयः॥२०८॥ मालिनीच्छन्दः इति वृषभकवीन्द्रोतितं मार्गमेनं वयमपि च यथावद् द्योतयामः स्वशक्त्या। सवितृकिरणजालोतितं व्योममार्ग विरलमुडुगणोऽयं मासयेत् किं न लोके ॥२०९।। है और स्वर्ग प्रदान करनेवाला है ॥२०५।। जो मनुष्य इस पुराणकी पूजा करते हैं उन्हें शान्तिकी प्राप्ति होती है, उनके सब विघ्न नष्ट हो जाते हैं, जो इसके विषयमें जो कुछ पूछते हैं उन्हें सन्तोष और पुष्टिकी प्राप्ति होती है; जो इसे पढ़ते हैं उन्हें आरोग्य तथा अनेक मजलोंकी प्राप्ति होती है और जो सुनते हैं उनके कर्मोंकी निर्जरा हो जाती है।०६॥ इस पुराणके अध्ययनसे दुःख देनेवाले खोटे स्वप्न नष्ट हो जाते हैं, तथा सुख देनेवाले अच्छे स्वप्नोंकी प्राप्ति होती है, इससे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है तथा विचार करनेवालोंको शुभ अशुभ आदि निमित्तों-शकुनोंकी उपलब्धि भी होती है ।।२०७।। पूर्वकालमें वृषभसेन आदि गणधर जिस मार्गसे गये थे इस समय मैं भी उसी मार्गसे जाना चाहता हूँ अर्थात् उन्होंने जिस पुराणका निरूपण किया था उसीका निरूपण मैं भी करना चाहता हूँ सो इससे मेरी हँसी ही होगी, इसके सिवाय हो ही क्या सकता है ? अथवा यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है क्योंकि जिस आकाशमें गरुड आदि बड़े-बड़े पक्षी उडते हैं उसमें क्या छो नहीं उड़ते ? अर्थात् अवश्य उड़ते हैं । २०८ ॥ इस पुराणरूपी मार्गको वृषभसेन आदि गणधरोंने जिस प्रकार प्रकाशित किया है उसी प्रकार मैं भी इसे अपनी शक्तिके अनुसार प्रकाशित करता हूँ। क्योंकि लोकमें जो आकाश सूर्यकी किरणोंके समूहसे प्रकाशित होता है उसी आकाशको क्या तारागण प्रकाशित नहीं करते ? अर्थात् अवश्य करते हैं। भावार्थमैं इस पुराणको कहता अवश्य हूँ परन्तु उसका जैसा विशद निरूपण वृषभसेन आदि गणधरोंने किया था वैसा मैं नहीं कर सकता। जैसे तारागण आकाशको प्रकाशित करते १. सुस्वप्नस्फीति-प०, सुस्वप्नस्याप्तिरेव ल०, म०, ८०, अ०। २. स्फातिः वृद्धिः । ३. वृषभः मुख्यः । ४. पतव्यतिलङ्घितम् म०, द०, ल० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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