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________________ । आचार्य अमृतचन्द्र : व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व तत्कालीन, आर्थिक एवं नैतिक जीवन के पक्ष को अपनाया । हिन्दू जातियों में मौजूद अनेकों नियमों तया नियन्त्रगों को शनैः शनैः अपनाना प्रारम्भ किया और जातिप्रथा का ढांचा भी जैनधर्म में हिन्दू धर्म की तरह निर्मित हो गया।' यहाँ तक कि मृतक के शरीर को जलाना, उसकी राख को पानी में सिराना आदि सामाजिक रूढ़ियां भी जैनों ने हिन्दुधर्म से ग्रहण की। हिन्दुओं के उत्सवों को भी जैनों ने अपनाया । इस तरह भट्टारकों का प्रभाव तत्कालीन समाज पर स्थापित होता गया । वे समाज के कर्णधार एवं शासक वन गये । इनमें धर्मविहित आचारविचारों का अभाव और धार्मिक भ्रष्टाचार का प्रभाव बढ़ता गया । शिथिलाचारी मुनियों से दिगम्बर परम्परा में भट्टारकों का पंथ उदित हुआ ! प्रारम्भ में इन्होंने वनवास छोड़कर मन्दिरों में रहना शुरू किया, फिर मन्दिरों के निमित्त से दानादि ग्रहण करने लगे और इस तरह धीरे-धीरे हिन्दु महन्तों की तरह पूरे मठाधीश बन गये। निवास स्थान के रूप में मठों और मन्दिरों का निर्माण तथा उपयोग: इसी के प्रबन्धादि के लिए भूमि आदि का दान लेना, ग्रन्थ लेखन तथा संरक्षण, चमत्कार आदि के द्वारा धर्म का उद्योत करना; शासकवर्ग से सम्बन्ध रखना आदि इनके मुख्य काम थे। इनमें से अनेकों ने सामयिक स्थिति के अनसार धर्म की रक्षा में सहयोग दिया कि बुराइयों से ये भी नहीं बच सके । इस युग को हम जेनेतर संस्कृति के साथ प्रादान प्रदान का युग कह सकते हैं। यद्यपि इस यग में बाह्य प्राचार-विचार, पूजा द्धिति, त्यौहार उत्सव आदि में हिन्दू सम्प्रदायों के साथ जैन धर्म का बहुत कुछ आदान प्रदान हुआ, तथापि जैनधर्म को सैद्धांतिक मूलभित्ति अडिग रही । उसके मौलिक विश्वास और परम्पराएं अडिग बनी रहीं; इन्हीं कारणों से वह भारत का एक स्वतन्त्र एवं प्रमुख धर्म बना रहा। उसके प्रेरक तत्व . सजीव बने रहे और उनके कारण इसमें अनुयायियों का उत्साह सजग रहा ।" 1. The Jain Cornmuntics adopted this feature of Sucialcconomic and iteologi cal life of losia and gradually Listes, adoptiog many restrictions and prohibitions, which existed in Hindu castcs took shape fa Jainism also. (I be Ileart of Jainism, p. 55) "Burning dead body, the ashes are thrown ja water erc... all these rites... were introduced in Jain Practicc in medieval Period and were borrowed mainly from Hinduism. (The Heart of Jainism, P. 78) ३. दक्षिण भारत में जैनधर्म, पृष्ठ १६८ भारतीय इतिहास, एक दष्टि, पृष्ठ १७८-१७६ Mirclinine
SR No.090002
Book TitleAcharya Amrutchandra Vyaktitva Evam Kartutva
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUttamchand Jain
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, Biography, & Literature
File Size9 MB
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