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________________ जीवन परिचय ] [ ६९ प्राचार्य परम्परा में अमृतचन्द्र का स्थान आदि तीर्थकर भगवान ऋषभदेव से लेकर अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर पर्यन्त अक्षुण्ण गति से प्रवाहित जैन अध्यात्म, योग, सिद्धान्त, , तत्त्वज्ञान तथा प्राचार मूलक परम्परा को अंग-पूर्व ज्ञानधारी आचार्यों ने भली भांति प्रचलित तथा प्रसारित किया, किन्तु उक्त परम्परा मौखिक रूप से ही प्रवमान रही। पश्चात् ईस्वी सन् (३८ से ६६) में आचार्य घरसेन ने इस परम्परा में अत्यंत सुयोग्य दो प्राचार्य शिष्यों को सूशिक्षित किया। वे दोनों आचार्य श्रमणों की लिखित श्रुतपरम्परा के "सूर्य तथा चन्द्र' की भांति "प्रकाशक बने । उनके नाम हैं प्राचार्य पुष्पदंत । ६६ से १०१ ईस्वी)लथा आचार्य महस(६६से :१६ ईवीशाचर्मद्वप ने सर्वप्रथम 'षट् खण्डागम श्रुत की रचना की, जिसमें श्रमणपरम्परा से प्राप्त सिद्धान्त तथा तत्त्वज्ञान विषयक गंभीरतमज्ञान भण्डार भरा है। प्राचार्य पुष्पदंत भूतबलि के ही समकालीन प्राचार्य गुणधर (५७-१५६ ईस्वी) हुए जिन्होंने "कषायपाहड़मत्त' की रचना कर उक्त ज्ञान भण्डार को विशेष रूप से समृद्ध एवं सम्पुष्ट किया। उनके पश्चात् आचार्य कुन्दकुन्द (पद्मनंदि) ई. १२७-१७६ ) हुए जिनके काल में अनवरत प्रवहमान दिगम्बर जैनाचार्यश्रमणपरम्परा में नवीनशाखा का जन्म (ईस्त्री द्वितीय सदी में) हुआ जो श्वेताम्बर जैन परम्परा के रूप में विकसित हुई । कुन्दकुन्द दिगम्बर जैन श्रमणपरम्परा, जो कि मूल तथा प्राचीन परम्परा थी, के प्रमुख बने रहे। उनका संघ मूलसंघ या कुन्दकुन्दान्बय के नाम से विश्रुत बना रहा। उन्होंने मुल संघ की दिगम्बर परम्परा के आचार तथा विचारों को पूर्ववत् कायम रखा, अबकि नबीन उत्पन्न श्वेताम्बर शाखा ने मूलसंघ के प्राचार. तथा रीति रिवाजों को छोड़कर निर्ग्रन्थ-नग्न (दिगम्बर) परम्परा के आचार का परित्याग कर दिया तथा "श्वेतवस्त्र' पहिनना प्रारम्भ कर दिया। मूल संघ की दिगम्बर परम्परा की सुरक्षा तथा अविच्छिन्नता बनाये रखने के कारण आचार्य कुन्दकुन्द का नाम तीर्थंकर महावीर व १. जैनधर्म, पृष्ठ २६१. सिद्धान्तानार्य पं. कैलाशचन्द्र २. वही, पृष्ठ २६१ तथा देखियेः-- " An Epitome of Jainism by Puranchand Nahar & Krishna Chandra Ghosh (1917), Page 10. (Introduction). "Gradually the manners and customs of the Church changed aud Original Practics of going abroad naked was a handoned. The scetic began to wear th> White Robe".
SR No.090002
Book TitleAcharya Amrutchandra Vyaktitva Evam Kartutva
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUttamchand Jain
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, Biography, & Literature
File Size9 MB
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