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________________ २१४ अंगपण्णत्ति ३-निमित्त दोष-व्यंजन, अंग, स्वर, छिन्न, भौम, अन्तरिक्ष, लक्षण, स्वप्न इन अष्ट प्रकार के निमित्तों से शुभाशुभ कथन करके आहार ग्रहण करना निमित्त दोष है। ४-आजीव दोष-अपने जाति, कुल, विद्या, तपश्चरण आदि के माहात्म्य को प्रकट करके आहार ग्रहण करना आजीव दोष वा स्वगुण स्तवन दोष है। ५-वनीपक वा इच्छाविभाषण दोष---कुत्ता, भिखारी आदि के दान देने से पुण्य होता है क्या ? दाता के द्वारा पूछने पर दाता के अनुकूल कथन करके आहार ग्रहण करना वनीपक दोष है। ६-पूर्व स्तुति दोष-जो साध स्तुति वाचक वचनों के द्वारा आहार के पूर्व दाता की स्तुति करके आहार लेता है वह पूर्व स्तुति दोष है । ___७-पश्चात् स्तुति दोष-आहार करने के बाद दाता की स्तुति करता है वह पश्चात् स्तुति दोष है । ८-क्रोध दोष-क्रोध के वशीभूत हो दातार को डाँट फटकार करके आहार लेना क्रोध दोष है। ९-मान दोष-मान कषाय के वशीभूत होकर आहार लेना मान दोष है। १०-माया दोष-छल कपट करके आहार लेना माया दोष है। ११-लोभ दोष-आहार दान देने से शभ भोगों की प्राप्ति होगी, इत्यादि वचनों के द्वारा दाता को लोभ दिखाकर आहार लेना लोभ दोष है। १२-वश्यकर्म दोष-वशीकरण मन्त्र आदि देकर आहार लेना वश्यकर्म दोष है। १३-चिकित्सा दोष-रोग शमन औषधियों का आहार के लिए उपयोग करना अथवा रोगों की चिकित्सा बताकर आहार लेना चिकित्सा दोष है। १४-विद्योपजीवन दोष-हम तुमको ऐसी विद्या' देंगे जिससे तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जायेंगे इत्यादि वचनों से गृहस्थ को आकर्षित करके आहार लेना विद्योपजीवन दोष है। १५-मन्त्रोपजीवन दोष-गृहस्थों को मन्त्र देने की आशा देकर मन्त्र १. जो साधना से सिद्ध होती है वह विद्या कहलाती है ।
SR No.090001
Book TitleAngpanntti
Original Sutra AuthorShubhachandra Acharya
AuthorSuparshvamati Mataji
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year1990
Total Pages270
LanguageHindi, Sanskrit, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size22 MB
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