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________________ १०८ अंगपण्णत्ति शरीर में रसादिक के रहने पर भी ऊपर से रूप गुण की अपेक्षा उसको कृष्ण कहना। असंभवता का परिहार करते हुए वस्तु के किसी धर्म का निरूपण करने में प्रवृत्त वचन को संभावना सत्य कहते हैं। जैसे इन्द्र जम्बूद्वीप को लौट दे अथवा उलट सकता है। आगमोक्त विधि निषेध के अनुसार अतीन्द्रिय पदार्थों में संकल्पित परिणामों को भाव कहते हैं । उसके आश्रित जो वचन हो उसको भाव सत्य कहते हैं। जैसे-शुष्क, पक्व, तप्त और नमक, मिर्च, खटाई आदि से अच्छी तरह मिलाया हुआ द्रव्य प्रासुक होता है। यहाँ पर यद्यपि सूक्ष्म जीवों को इन्द्रियों से देख नहीं सकते तथापि आगम प्रामाण्य से उसकी प्रासुकता का वर्णन किया जाता है। इसलिए इस ही तरह के पापवर्ज वचन को भावसत्य कहते हैं ॥ ८२ ।। ___ किसी विवक्षित पदार्थ की अपेक्षा से दूसरे पदार्थ के स्वरूप का कथन करना इसको प्रतोतिसत्य अथवा अपेक्षिक सत्य कहते हैं। जैसे किसी छोटे या पतले पदार्थ की अपेक्षा से दूसरे पदार्थ को बड़ा लम्बा या स्थूल कहना। नैगमादि नयों की प्रधानता से जो वचन बोला जाय उसको व्यवहार सत्य कहते हैं । जैसे नैगमनय की प्रधानता से 'भात पकाता हूँ' संग्रहनय की अपेक्षा 'सम्पूर्ण सत्य है' अथवा सम्पूर्ण असत्य है ।। दूसरे प्रसिद्ध सदृश पदार्थ को उपमा कहते हैं। इसके आश्रय से जो वचन बोला जाय उसको उपमा सत्य कहते हैं। जैसे पल्य । यहाँ पर रोमखण्डों का आधारभूत गड्ढा, पलय,- अर्थात् खास के सदृश होता है इसलिए उसको पल्य कहते हैं। इस संख्या को उपभासत्य कहते है। इस प्रकार ये दश प्रकार के सत्य के दृष्टान्त हैं इसलिए और भी इसी तरह जानना। हस्सो रज्झदि कूरो पल्लोवममेवमादिया सच्चा । आमंणि आणवणी पुच्छणि जाचणी य पणवण्णी ॥३॥ ह्रस्वः रध्यति करः पल्योपममेवमादिकानि सत्यानि । आमंत्रणी आज्ञापनी पृच्छनी याचनी प्रज्ञापनी ॥ पच्चक्खाणी संसयवयणी इच्छाणुलोमिया तच्च । णवमी अणक्खरजुदा एवं भासा परूवेदि ॥४॥
SR No.090001
Book TitleAngpanntti
Original Sutra AuthorShubhachandra Acharya
AuthorSuparshvamati Mataji
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year1990
Total Pages270
LanguageHindi, Sanskrit, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size22 MB
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