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________________ १०४ अंगपण्णत्ति विशेषार्थ जैसे द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा सामान्य ज्ञान अनादि अनन्त है । पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा सादि सांत है। अभव्य की अपेक्षा कुमति, कुश्रुतिज्ञान अनादि अनन्त है, भव्य को अपेक्षा अनादि सांत है। सम्यग्दृष्टि होकर पुनः मिथ्यात्व में जाने की अपेक्षा सादि सांत है। कूअवधि सादि सांत है। मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्ययज्ञान सादि सांत है और केवलज्ञान सादि अनन्त है। इत्यादि रूप से ज्ञान के भेद-प्रभेदों का कथन करनेवाला ज्ञानप्रवाद है। ॥ इस प्रकार ज्ञानप्रवाद समाप्त हुआ। सत्यप्रवाद का कथन सच्चपवादं छटुं वाग्गुत्ति चावि वयणसक्कारो। वयणपओगं बारहमासा खलु वकवहुभये ॥ ७ ॥ सत्यप्रवादं षष्ठं वाग्गुप्तिश्चापि वचनसंस्कारः। वचनप्रयोगो द्वादशभाषाः खलु वक्तृबहुभेदाः॥ बहुविहमिसाभिहाणं दसविहसच्चं मया परूवेदि । जीवाण बोहणत्थं पयाणि छसुत्तरा कोडी ॥ ७९ ॥ बहुविधमृषाभिधानं दशविधसत्यं मया प्ररूप्यते । जीवानां बोधनार्थं पदानि षडुत्तरा कोटिः॥ तंजहा। असच्चणिव्वत्ति मोणं वा वाग्गुत्ति, वयणसक्कारकारणाई उरकंठसिरजिब्भामूलदंतणासिकातालुओढणामाणि अट्ठाणाणि, पिट्ठदाईसिपिट्ठदाविविदाईसिविविददासविविदरुवा पंचपयत्ता वयणसवकारकारणाणि, सिटूदुट्ठरूवो वयणपओगो तल्लक्खणसत्थं सक्कायाइवायरणं। बारह भाषा-इणमणेण कियमिदि अणट्टकहणमब्भक्खाणं णाम १ परोप्परविरोहहेदु कलहवाया २ पिट्ठदो दोससूयणं पेसुण्णवाया ३ धम्मत्थकाममोक्खाऽसंबद्धवयमसंबद्धालाओ ४ इंदियविसयेषु रइउप्पाइया वाया रदिवाया ५ तेस अरदिउप्पादिया वाया अरदिवाया ६ परिग्गहाज्जणसंरक्खणाइआसत्तिहेदु वयणमवाहिवयणं ७ ववहारे वंचणाहेदु वयणं णियडिवयणं ८ तवणाणादिसु अवणियवयणमवणदिवयणं ९ थेयहेदुवयणं मूसावयणं १० सम्मग्गोवदेसकं वयणं सम्मदसणवयणं ११ मिच्छा. मग्गोवदेसकं वयणं मिच्छादसणवयणमिदि १२ ।
SR No.090001
Book TitleAngpanntti
Original Sutra AuthorShubhachandra Acharya
AuthorSuparshvamati Mataji
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year1990
Total Pages270
LanguageHindi, Sanskrit, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size22 MB
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