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________________ ७८५ अनुयोगद्वारसूत्रे तेलुक्कपूइयस्स, खाइयभावे ठियास जिण इण्यो । मुही नियमेयं, अणंतरं परंपर सेसं ॥२॥ छाया-वैशाखशुद्धकादश्यां शुभप्रथमपोरुपीकाले । महासेनवनोधाने पावापुरीषु स्थिते रम्ये ॥१॥ त्रैलोक्यपूजितस्य क्षायिकभावे स्थितस्य जिनराजस्थ । मुखतो निर्गतमेतत् अनन्तरं परम्पर शेषम् ॥२॥ इति इति चतुर्थ पञ्चमं च द्वारम् ॥४॥२॥ तथा च-पुरुषो वक्तव्यः यस्मात्पुरुषादिदं सामायिक निर्गतं स पुरुषो वक्तव्यः यथा-अर्थतो भगवतो महावीरादिदं निर्गतं, मूत्रतश्व गौतमादिगणधरेभ्यः । इति । तदुक्तम् 'अत्थो य महावीरा, सुत्तो गोयमाइभो । निग्गयं पुण अग्हाण, पत्तं चेदमणुकमा ॥३॥ छाया- अर्थतश्च महावीराव, सूत्रतो गौतमादितः। निर्गतं पुनरस्माकं, पाप्तं चेदमनुक्रमात् ॥ ३ ॥ इति षष्ठं द्वारम् ॥ ६ ॥ तथा-येन कारणेन तीर्थकरः सामायिकं कथयति, येन च कारणेन गणधरास्तत शृण्वन्ति, तत्कारणं वक्तव्यम् । यथा-'मया तीर्थकरनामगोत्रं बद्धं, तच्च वेदयतिव्य'-मितिकारणमाश्रित्य तीर्थकरः सामायिकं कथयति। का तात्पर्य यही पूर्वोक्तरूप से है तथा जिस पुरुष से सामायिक निर्गत हुआ है, उस पुरुष का भी कयन करना चाहिये-जैसे अर्थ की अपेक्षा यह सामायिक भगवान् महावीर से निकला है और सूत्र की अपेक्षा गौतमादि गण घरों से निकला है-तदुक्तम् ' अस्थओ य महावीरा' इत्यादि । इस गाथाको तात्पर्य यही पूर्वोक्त है। तथा जिस कारण से तीर्थकर सामायिक कहते हैं और जिस कारण से गणधर उसे सुनते हैं उस कारण का भी कथन करना चाहिये । जैसे-मैंने तीर्थकर नाम गोत्र का बन्ध किया है, अतः वह मुझे वेदन करने के योग्य है' इस પુરૂષથી આ સામાયિક નિર્ગત થયેલ છે, તે પુરૂષનું પણ કથન કરવું જોઈએ જેમ અર્થની અપેક્ષા આ સામાયિક ભગવાન મહાવીરથી નિગત છે. અને भूनी अपेक्षा गौतम यथा नित छ.तत 'अत्यो य महा. वीरा' त्या भागाथातुं तात्पर्य पूर्वात ३५मा छे. तथा २ ॥२४था તીર્થકર સામાયિક કહે છે, અને જે કારણથી ગણધરે તેને સાંભળે છે, તે કારણુ કથન પણ કરવું જોઈએ. જેમ-મેં તીર્થકર નામ. શેત્રને બંધ
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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