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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २४१ क्षेत्रसमवतारादीनां निरूपणम् ७२५ बाह-स एष कालसमवतार इति। अथ भावसमवतारं निरूपयति । तत्र-अथ कोऽसौ भावसमवतारः ? इति शिष्यमश्नः। उत्तरयति-भावसमवतार:-भावस्यक्रोधादेः समवतार: आत्मसमवतारस्तदुभयसमवतारति द्विविधः प्रज्ञप्तः । तत्र - क्रोध आत्मसमवतारेण आत्मभावे समवतरति, तदुभयसमवतारेण-माने समव: तरति आत्मभावे च । तथा-मानम् आत्मसमचतारेण आत्मभावे समचतरति, तदुरहता है । (तीतद्धा अणागतद्धाउ आयसमोयारेण आयभावे समोय. रंति, तदुभयलमायारेणं सम्घद्धाए समोयरति आयभावे य) अतीत काल और अनागत काल ये आत्मसमवतार की अपेक्षा आत्मभाष में रहते हैं, तथा उभय समवतार की अपेक्षा सर्वाद्धा काल में रहते हैं और आत्मभाव में भी रहते हैं। (से तं कालसमोयारे) इस प्रकार यह काल समवतार का विचार है । (से किंत भावसमोयारे) हे मदत ! भाव समवतार क्या है ? (भावसमोयारे) क्रोधादिकषायों का जो समवतार है, वह भाव समवतार है। यह भाव समवतार (दुविहे पण्णत्ते) दो प्रकार का कहा है । (ले जहा) जैसे-(आयसमो. यारे तदुभयसमोयारे) आत्मसमवतार और तदुभय समवतार ! (कोहे आयसमोयारेणं आयभावे समोयरइ, तदुभयसमोयारेणामाणे समोयरइ, आयभावे य) क्रोध आत्मसमवार की अपेक्षा आत्मभाव में-निजमें-रहता है तथा उभय समवतार की अपेक्षा (तीतद्धा अणागतद्धाउ आयसमोयारेण भायभावे समोयर ति, तदुभयसमोयारेणं सव्वद्धाए समोयरंति आयभावे य) मतीत भने मनाया गया આત્મસમવતારની અપેક્ષા આત્મભાવમાં રહે છે, તેમજ ઉપાય સમવતારની अपेक्षा सद्धिा मा २७ छ, भने मामलामा ५२ छ (सेतं. कालसमोयारे) मा प्रमाणे मा ४ समतारने दिया२ छे. (से किं ।' भावसमोयारे) BR ! भार सभवतार शुछ ? (भावसमोसारे) या पायान। २ सभतार छ, a समता छ, मामासमता२ (दुविहे पण्णते) मे आरन वाम मावेश छ. (तजहा) रेभ(आयसमोयारे तदुभयसमोयारे) मामसभपता२ मने तनय समवतार (कोहे आयसमोयारेणं आयभावे समोयरइ, तदुभयसमोयारेण माणे, समोयरइ, आयभावे य)- ५ આત્મસમવતારની અપેક્ષા, આત્મભાવમાં-નિજમાં રહે છે, તેમજ ઉભય अ० ९१
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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