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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २३५ नवविधमसख्येयकनिरूपणम् लोगागासपएसा१, धम्मा२ धम्मे३गजीवदेसा४ य । दवटिया निओआ५, पत्तेया६ चेव बोद्धव्या ॥१॥ ठिइवंधज्झबसाणा७ अंणुभाग८ जोगछेपपलिभाग९। दोण्ह य समाण समया१०, असंखषक्खेवया दस उ ॥२॥ छाया-लोकाकाशमदेशा धर्माधर्मकजीवदेशाश्च । द्रव्याथिका नियोगाः प्रत्येकाश्चैव बोद्धव्याः॥१॥ स्थितिबन्धाध्यवसाना अनुभागा योगच्छेदभतिभागा। द्वयोश्च समयोः समया असंख्येयाः प्रक्षेपका दश तु ॥२॥ इति । एते दश प्रक्षेपाः पूक्तेि वारत्रयवगिते राशौ प्रक्षिप्यन्ते । इत्थं यो राशि: पिण्डितो भवति, तस्य पुनः पूर्ववद् वारत्रयं वर्गः क्रियते । ततश्च एकस्मिन् रूपे ऽपसारिते उत्कर्षकम् असंख्येयासंख्येयक भवति । इत्थं नवविधमप्यसंख्येयकमुक्तमिति ॥सू० २३५॥ इस प्रकार ये प्रत्येक दश प्रक्षेप असंख्यात स्वरूप हैं । उक्त च करके जो ये दो गाथाए' लोगागासपएसा' इत्यादि 'ठिहबंधज्झवसाणा' इत्यादि यहां उद्धृत की गई हैं, वे इन्हीं दश प्रक्षेपकों के नाम को कहती हैं। ये दश प्रक्षेपवारत्रयवर्गित पूर्वोक्त राशि में प्रक्षिप्त किये जाते हैं। इस मकार इनके उस राशि में प्रक्षिप्त करने पर जो राशि आती है, उसका पुनः पूर्व के जैसा तीन चार वर्ग करना चाहिये । और फिर आगत राशि में से एक कम कर देना चाहिये । इस प्रकार जो राशि का प्रमाण बचे वह उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात है। इस प्रकार से यह नव प्रकार के असंख्यात का वर्णन जानना चाहिये ॥ सू० २३५ ॥ अस यात १३५ छ. G: य २ मा मे आया। लोगागास. पएखा' त्यात 'ठिइबंधज्यवसाणा' पणेरे अडीत ४२वामां आवी . त એજ દશ પ્રક્ષેપકોના નામને કહે છે. આ દશ પ્રક્ષેપ વારત્રય વર્ગિત પૂર્વોક્ત રાશિમાં પ્રક્ષિપ્ત કરવાથી જે રાશિ આવે છે, તેને ફરી પૂર્વની જેમ જ ત્રણ વાર વગે કરવું જોઈએ. અને પછી આગત રાશિમાંથી એક આ છો કરી નાખવો જોઈએ, આ પ્રમાણે જે રાશિનું પ્રમાણુ બાકી રહે તે ઉત્કૃષ્ટ અસંખ્યાતાસંખ્યાત છે. આ પ્રમાણે આ નવ પ્રકારના અસંખ્યાતન વર્ણન જાણવું જોઈએ. એ સૂત્ર-૨૩૫ છે
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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