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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २३२ परिमाणसंख्या निरूपणम् भङ्गः । अथ चतुर्थमङ्गमाह - 'असंवयं असंत हिं' इत्यादि । असद् वस्तु असद्धि वस्तुभिरुपमीयते । यथा - खरविषाणं तथा शशविषाणमिति । अत्रोपमानभूतं खरविषाणं कालत्रयेऽप्यसत्त्वादसत्, उपमेयभूतं शशविषाणमपि कालत्रयेऽप्यसवा दसत् । इत्थं चात्र असता असदुपमीयते । इति चतुर्थो भङ्गः । प्रकृतमुपसंहरन्नाह - सैषा औपम्यसंख्येति ।। सू०२३१ ॥ I - अथ परिमाण संख्यां निरूपयति मूळम् - से किं तं परिमाणसंखा ? परिमाणसंखा - दुविहा पण्णत्ता, तं जहा - कालिय सुयपरिमाणसंखा दिट्टिवाय सुयपरिमाणसंखाय । से किं तं कालियसुयपरिमाणसंखा ? कालिय जानना चाहिये । चतुर्थ भंग इस प्रकार से हैं- इसमें 'असंवयं असंतहिं उचमिउ तह' असद्रूप पदार्थ असदूर पदार्थ से उपमित हुआ है। (जहा) जैसे - (खर विसाणं तहा बसविसाणं) खर ( गधा ) विषाण (श्रृंग) हैं-वैसे ही शशविषाण ( शशलाके श्रृंग) है । अर्थात् खरविषाण के जैसे शशविषाण हैं । इस वाक्य में उपमानभूत खरविषाण है, सो थे त्रिकाल में भी व विशिष्ट न होने के कारण असद्रूप है और उपमेयभूत जो शशविषाण है वे भी कालत्रय में असत्व विशिष्ट होने के कारण असद्रूप हैं। इस प्रकार असत् से असत् उपमित हुआ जानना व्याहिये| यह चतुर्थभंग है । (सेतं ओम्मखा) इस प्रकार से यह औपम्यसंख्या का निरूपण जानना चाहिये ॥ ० २३१ ॥ चतुर्थ भांग मा प्रभावे छे. भाभां 'असंतयं असंतपहिं उत्रमिज्जइ' मसहूइस पहार्थ अस६३५ महार्थ वडे उयमित थयेल छे. (जा) नेम है (खर विस्राणं तहा ससविसाणं) पर (गर्हल) ना विषाणु (ञ) छे, तेवा G શશ વિષાણુ (શશલાના શ્રૃંગે) છે. એટલે કે ખર વિષાણુની જેમ શવિષાણુ છે. આ વાકયમાં ઉપમાનભૂત ભવિષાણુ છે, તે એ ત્રિકાળમાં પણ સર્વ વિશિષ્ટ નહાવાથી મસરૂપ છે. અને ઉપમેયનૂન જે વિષાણું છે, તે પણ કાલત્રયમાં અસત્વ વિશિષ્ટ હાવા બદä અસરૂપ છે. આ પ્રમાણે 'અહીં' અસથી અસત્ ઉપમિત થયેલ જાણવું જોઇએ. આ ચતુર્થાં લગ છે. ( से तं ओबम्मसंखा) मा प्रभाये या औषभ्यस भ्यालु निश्पक्ष हो | सूत्र २३१ ॥ .
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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