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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २२९ प्रदेशदृष्टान्तेन नयप्रमाणम् ६०३ भावात् नोजीवत्वं बोध्यमिति भावः । एवं खंधे परसे से पए से नो खधे'स्कन्धः प्रदेशः स प्रदेशो नो स्कन्धः । अनन्तस्कन्धात्मक समस्त स्कन्धैक देशक स्कन्धवर्तिनः प्रदेशस्प समस्तस्कन्धवृत्तित्वाभावाद् नो स्कन्धत्वमिति भावः । एवं वदन्तं शब्दनयं समभिहतः = नानार्थं सममिरोहणात् समभिरूडो नयो भणति - यन्त्र भणसि, - 'धम्मे परसे से पए से धम्मे' इत्यादि, तन्न युज्यते वक्तुम् । कुतो न युज्यते वक्तुम् ? इत्याह- यदुच्यते- 'धम्मे परसे से परसे धम्मे' इत्यादि । अत्र धर्मे प्रदेशः, धर्मः पदेशश्चेति द्विविधच्छायायाः संभवात् 'धम्मे' इति सप्तम्यन्तं प्रथमान्तं वा पदमिति संदेहः संजायते । सप्तम्यां तत्पुरुषः, वने हस्तीवनहस्तीएक प्रदेश को नो जीव कहा है । 'खंधे परसे से पएसे नो खंधे' इसी प्रकार जो एक स्कन्धात्मक प्रदेश है वह नो स्कंध है । तात्पर्य यह है है - कि अनन्तस्कन्धात्मक जो समस्त स्कंध है - पुद्लास्तिकाय है उसका एकंदेश भूत जो एक स्कन्ध है, उसमें रहनेवाले प्रदेश का समस्त स्कंधरूप पुद्लास्तिकाय में रहना नहीं है-अर्थात् उसकी उसमें वृप्ति नहीं है - इसलिये एक स्कंधात्मक प्रदेश को नो स्कंध कहा है । ( एवं वयंतं सद्दनयं समभिरूढो जं भणइ, जं भणसि धम्मे परसे से परसे धम्मे जीवे परसे से पए से नो जीवे, खंधे परसे से पएसे नो खंधे- तं न भवइ कम्हा इथं खलु दो समासा भवंति तं जहां-तप्पुरि से य कम्मधारए य-तं ण णज्जद्द कयरेणं समासे णं भणसि किं तप्पुरिसेणं किं कम्मधारएणं) इस प्रकार कहनेवाले शब्दनय से समभिरु नय ने कहा- जो तुम कहते हो कि जो प्रदेश धर्मात्मक है वह धर्माવૃત્તિત્વના અભાવ છે. એથી તે એક પ્રદેશને નાજીવ કહેવામાં આવેલ છે; " खंधे परसे से पएसे नो खंधे" भी प्रभाथे ले खेड सुन्धात्म अहेश छे,' તે નાધ છે. તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે અન...તસ્ક ́ધાત્મક જે સમસ્ત સ્કંધ છે. પુદ્ગલાસ્તિકાય છે, તેના એક દેશ ભૂત જે એક સ્કંધ છે, તેમાં રહેનાર પ્રદેશનુ સમસ્ત સ્કંધ રૂપ પુદ્ગલાસ્તિકાયમાં રહેવુ થતુ નથી. એટલે કે તેની તેમાં વૃત્તિ નથી. એટલા માટે એક સ્કંધાત્મક પ્રદેશને નાસ્કર્ષ वामां आवे छे. ( एवं वयंत सहनयं समभिहृढो भइ, जं भणसि - धम्मे परसे, से परसे धम्मे जीवे परसे से पपसे नो जीवे, खंधे पपसे से पसे नो खंधे -त न भवइ कम्हा इत्थं खलु दो समता भवंति - तजहा - तप्पुरि से य कम्मधारए य त' ण णज्जइ कयरेणं समासेणं भणासि किं तत्पुरिसेणं कि कम्मधारएणं) मा प्रभा नाश राय समभि नये उधु-ले तभी હા છો કે જે પ્રદેશ ધર્માત્મક છે, તે ધર્માસ્તિકાયરૂપ છે, યાવત્ જે પ્રદેશ
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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