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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २१५ द्विन्द्रियादीनामौदारिकादिशरीरनि० ४३९ सर्पिण्यवसर्पिणीभिरपहियन्ते कालतः, क्षेत्रतः असंख्येया श्रेणयः प्रतरस्यासंख्येयभागे तासां खलु श्रेणीनां विष्कम्ममूचिः असंख्येया योजनकोटीकोटयः । असंख्येयानि श्रेणिवर्गमूलानि । द्वीन्द्रियाणाम् औदारिकबद्धैः भतरोऽपहियते, असंख्येल्लया य मुक्केल्लया य) एक षद्ध औदारिक शरीर और दूसरे मुक्त औदारिक शरीर (तत्थ णं जे ते बल्लिया ते णं असंखिज्जा) इन में जो बद्ध औदारिक शरीर हैं, वे यहां असंख्यात है। (असंखिज्जाहिं उस्सप्पिणीओसपिणीहि अवहीरंति कालओ) असंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के जितने समय होते हैं, उतने समय प्रमाण वे शरीर काल की अपेक्षा हैं । (खेत्तओ असंखेज्जामो सेढीओ पय. रस्स असंखिज्जइभागे) क्षेत्र की अपेक्षा वे शरीर प्रतरके असंख्या. तवें भाग में वर्तमान असंख्यात श्रेणियों के प्रदेशों की राशि प्रमाण हैं । यहाँ पर प्रतर के असंख्यातवें भाग में वर्तमान जो असंख्यात आकाशश्रेणियां हैं वे ग्रहण की गई हैं । अब इन श्रेणियों की जो विष्कंभसूचि है उसका प्रमाण कहते हैं (तासि णं सेढीण विक्खंभसूई असंखेज्जाओ जोयणकोडाकोडीओ असंखेज्जाई सेढिवग्गमूलाई) यह विष्कंभसूचि असंख्यात कोटीकोटि योजनों की जाननी चाहिये। इतने प्रमाण बाली विष्कंभसूचि असंख्यात श्रेणियों के मूलरूप होती है। तात्पर्य इसका यह है-एक आकाश अणि में रहे. हुए महरि शरी२ अने भी भुत भौहार शरीर (तस्थ गंजे के बद्धेल्लया वेणं असंखिज्जा) मामा रे मई मोहा शरी। छ, ते स महसभ्यात छे. (असंखिज्जाहिं उस्सप्पिणीओसप्पिणीहिं अवहीरति कालओ) मस'. આત ઉત્સર્પિણ અને અવસર્પિણી કાળના જેટલા સમયે હોય છે, તેટલા अभय प्रभात शरीर सनी अपेक्षा छे. (खेत्तो असंखेज्जाओ सेढीयो पयरस असंखिजइभागे) क्षेत्रनी अपेक्षा ते शरी२ प्रतरना असभ्यात ભાગમાં વર્તમાન અસંખ્યાત શ્રેણિઓના પ્રદેશની રાશિ પ્રમાણ છે. અહીં પ્રતરના અસંખ્યાતમા ભાગમાં વર્તમાન જે અસંખ્યાત આકાશ શ્રેણિઓ છે, તેમનું ગ્રહણ કરવામાં આવ્યું છે. હવે આ શ્રેણિઓની જે વિષ્કભસૂચિ छ, तनु प्रभात २५० ४२वामां आयु छे. (तासि गं सेढीणं विक्खंभसूई असंखेजाओ जोयणकोडाकोडीओ, असंखेन्जाइं खेटिवगमूलाई) मा Aura સૂચિ અસંખ્યાત કેટીકોટિ ચાજનેની જાણવી જોઈએ આટલા પ્રમાણુવાળી વિભ સૂચિ અસંખ્યાત શ્રેણિઓના વર્ગમૂળ રૂપ હોય છે. તાત્પર્ય આનું આ પ્રમાણે છે કે, એક આકાશએણિમાં આવેલા સમસ્ત પ્રદેશ અસંખ્યાત
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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