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अनुयोगद्वारसूत्रे तिरिक्खजोणियाणवि ओरालियसरीरा एवं चेव भाणियवा। पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं भंते ! केवइया वेउबियसरीरा पण्णता? गोयमा! वे उब्वियसरीरा दुविहा पण्णत्ता, तं जहा बद्धेल्लया य मुकेल्लया य। तस्थ ण जे ते बद्धेल्लया ते णं असंखिज्जा असंखिज्जाहिं उस्सप्पिणीओसप्पिणीहि अवहीरंति कालओ। खेतओ असंखिज्जाओ सेढीओ पयरस्स असंखिज्जहभागे। तासि णं सेढीणं विक्खंभसूई अंगुलपढमवग्गमूलस्स असंखिजइभागे। मुकेल्लया जहा ओहिया ओरालिया तहा माणियबा। आहारयसरीरा जहा बेइंदियाणं, तेयगकम्मयसरीरा जहा ओरालिया ॥सू० २१५॥ __ छाया-द्वीन्द्रियाणां भदन्त ! कियन्ति औदारिकशरीराणि प्रज्ञतानि ? गौतम ! औदारिकशरीराणि द्विविधानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा-बद्धानि च मुक्तानि च । तत्र खजु यानि तानि बद्धानि तानि खलु असंख्येयानि, असंख्येयाभिरु.
अब सूत्रकार बीन्द्रियादि जीवों के औदारिक शरीरों की प्ररूपणा करते है--
'वेइंदियाण भंते ! केवया ओरालियसरीरा पण्णत्ता' इत्यादि।
शब्दार्थ:--(भंते) हे भदन्त ! (वेइंदिपाणं) हीन्द्रियजीवों के (ओरा. लियसरीरा) औदारिक शरीर (केवड्या पण्णत्ता) कितने कहे हैं ? (गोयमा) हे गौतम ! ( ओरालियसरीरा दुविहा पण्णत्ता) औदारिक शरीर दो प्रकार के कहे गये हैं (तं जहा) वे इस प्रकार से हैं- (बद्धे.
હવે સૂત્રકાર હીન્દ્રિયાદિ જવાના દારિકશરીરની પ્રરૂપણ કરે છે"बेबंदियाणं भंते ! केवइया ओरालियरीरा पण्णता " त्या:
सार्थ-(भंते !) 3 मत ! (बेइंदियाणं) द्वीन्द्रिय वाना (ओरालिय सरीरा) महार शरी। (केवइया पण्णत्ता) Rai अपामा मायां छ? (ओरालियसरीरा दुविहा पण्णसा) मोहर: शरी। ये माना पामा माया छे. (तंजहा) त मा प्रभारी छ. (बद्धेल्लया य मुस्केल्लया य) मे