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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १७९ दशनामनिरूपणम् समोसरणाणि माणि' इत्यादि गाथाऽस्ति, तत्रत्यं 'समोसरणाणि' इति पदमादायास्याध्ययनस्य 'समोसरणज्झयणं' इति-नामकृतम् । अस्यैव सूत्रस्य 'आयाणिय ज्झयण' नामकं पञ्चदशमध्ययनं 'जमईय' इत्यप्युच्यते । तत्र हेतुस्तु अध्ययनार• म्भे या 'जमईयं पडुप्पन्न ' इत्यादि गाथास्थं 'जमईय' इति पदं बोध्यम् । संपति प्रकृतमुपसंहरन्नाह-तदेतत् आदानपदेनेति ॥५० १७९॥ मूलम्-से किं तं पडिबक्खपएण?, पडिवक्खपएणं नवेसु गामागरणयरखेडकब्बडमडंबदोहमुहपट्टणासमसंवाहसन्निवेसेसु संनिविस्तमाणेसु अलिवा सिवा अग्गी सीयलो विसं महुरं कल्लालघरेसु अंबिलं साउयं जे रत्तए से अलत्तए जे लाउएं से अलाउए जे सुंभए से कुसुंभए आलवंते विवली अभासए । से तं पडिवक्खपएणं। से किं तं पाहण्णयाए ? पाहण्णयाएअसोगवणे सत्तवपणवणे चंपगवणे चूअवणे नागवणे पुन्नागवणे उच्छवणे दक्खवणे सालिवणे, से तं पाहण्णयाए। से किं तं यणं " ऐसा किया गया है। तथा इसी के द्वादश अध्ययन के प्रारम्भ में " चत्तारि समोसरणाणि प्राणि" इत्यदि गाथा है। तो वहां के " समोसरणाणिमाणि" इस पद को लेकर इस अध्ययन का नाम " समोसरणज्झयणं" ऐसा हो गया है। इसी सत्र का " आयाणियज्शयणं" नाम का १५ वा अध्ययन " जमइयं" इस नाम से भी कहा जाता है। सो इसका कारण यह है कि अध्ययन प्रारम्भ में "जमईयं पडुप्पन्नं" इत्यादि गाथा में "जमईथं" यह पद है! (से तं आयाणपएणं) इस प्रकार यह आदान पद से निष्पन्न नाम है। सूत्र.१७९॥ "मग्गज्झयणं " रामपामा मान्य छतमन मे सूचना मारमा अध्ययनना प्रारममा "चत्तारि समोसरणाणि माणि" वगेरे ॥॥ छे, तो तमन "समोसरणाणि माणि" मा पहना साधारे । अध्ययननु: नाम " समोसरणज्झयणं" मेराभवामा मयुछ. मा सूत्रना-"आयाणियज्झयण" नाम: १५भु अध्ययन “जमइयं " नामयी ५५ उपाय छे. तनुं १२. में छ, मा अध्ययनना प्रारममा "जमईय पडुपन्नं" वगेरे गाथामा मावत "जमझ्यं" मा ५६ छ (से तं आयाण पएणं) मा प्रमाणे 20 माहान પદથી નિષ્પન નામ છે. સૂ૦૧૭
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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