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________________ - अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २०५ अद्धापल्योपमस्वरूपनिरूपणम् ६७ अदापल्योपमम् । एतेषां पल्यानां कोटीकोटिर्भवेद् दशगुणिता । तद् व्यावहारिकस्य अद्धासागरोपमस्य एकस्य भवनि परिमाणम् ॥१॥ एतैः व्यावहारिकैः अद्धाल्योषमसागरोपमै कि प्रयोजनम् ? एतैः व्यावहारिकैः अद्धापल्योपमसागवहाँ से निकालना चाहिये । इस क्रम से करते २ जब वे समस्त बाल उस पल्प में से निकल चुके और इसके निकालने में जितना काल लगे, वह एक व्यावहारिक अद्वापल्योपम है। व्यावहारिक उद्धार पल्यो. पम में और इस व्यावहारिक अद्धापल्योपम में यह अन्तर है कि वहां एक २ वालग्र एक एक समय में निकाला जाता है, तब यहां पर एक एक बालाग्र सौ सौ वर्ष में निकाला जाता है। 'खीणे नीरए' इत्यादि पदों का अर्थ व्यावहारिक उद्धार पल्य के प्रकरण में स्पष्ट किया जा चुका है-अतः इन पदों का वैसा ही अर्थ यहां पर भी लगा लेना चाहिये। (एएहि पल्लाणं कीडाकोड़ी भविज दस गुणिया । तं ववहारियस्स अद्धासागरोवमस्ल एगस्त अवे परिमाणं) इन व्यावहारिक अद्धारल्यों की १० कोटीकोटिका-अर्थात् १० कोटीकोटि व्यावहारिक अापल्यों का एक ...व्यावहारिक श्रद्धासागरोपम होता है। (एएहिं वावहारिएहिं अद्धापलिओ. वमसागरोवमेहिं कि पोयणं) प्रश्न-इन व्यावहारिक अापल्पोपमों एवं व्यावहारिक अद्धा सागरोपमों से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? બહાર નીકળી ચૂક્યાં હોય, ત્યારે તેમને બહાર કાઢવામાં જેટલે કાળ પસાર થાય તે એક વ્યાવહારિક અદ્ધા પાપમ છે. વ્યાવહારિક ઉદ્ધાર ૫૯૫મમાં અને આ વ્યાવહારિક અદ્ધાપમમાં એ તફાવત છે કે ત્યાં એક એક ખાલા એક એક સમયમાં બહાર કાઢવામાં આવે છે, ત્યારે અહીં એક से मार से सौ वर्ष पश्यमाथी मार पास भावे . 'खीणे नीरए' परे पनि म व्याव:Bार ५८यना ५४२मा २५ट १२વામાં આવ્યો છે. એટલા માટે આ પદેને અર્થ તે પ્રમાણે જ અહી સમજી a नये. (एएसिपल्लाण कोडाकोडी भविज्ज दस गुणिया । त वावहारियस्स अद्धासागरोषमस्स एगप्त भवे परिमाण) मा व्यावहारि४ मापस्या५. મોની ૧૦ કેરીકેટિને એટલે કે ૧૦ કેટીકેટિ વ્યાવહારિક અદ્ધાપલને व्यापार मद्धा सागरो५. थाय छ: (एएहि वावहारिएहि अद्धापलिओवमशागरोवमेहि कि पोयण?). પ્રશ્ન-આ વ્યાવહારિક અદ્ધા પોપ અને વ્યાવહારિક અદ્ધા સાગરિપમેથી કયા પ્રજનની સિદ્ધિ થાય છે? 6त्तर-(एएहिं वावहारियहि अशापलिमोवमसागरोवमेहि नस्थि कि . चिप्पओयण, केवल पण्णवण्णा प०गविज्जइ) २व्यानि माया
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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