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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २०० प्रमाणाङ्गुलनिरूपणम्. ... ... . त्वम् उच्चता, उद्वेधा भूमिमध्येऽवगाहः, परिक्षेपः परिधिः, एषां द्वन्द्वस्ते माप्य: न्ते-प्रमाणविषयी क्रियन्ते । प्रमाणाङ्गुलेन पृथिव्यादीनामायामादि-प्रमाणपरिज्ञानं भवतीत्यर्थः । तदेतत्प्रमाणाङ्गुलं कतिविधम् ? इति सूचयितुमाह-तत प्रमाणा शुलं समासता संक्षेपतः श्रेण्यङ्गुलपतरागुलघनाङ्गुलेति त्रिविधम् । श्रेण्यगुलादि विवरीतुमाह-'असंखेज्जाओ' इत्यादि । पूर्वोक्तपमाणाङ्गुलेन यद्योजन तेन योजनेन असंख्येया योजनकोटीकोटयः संवर्तितसमचतुरस्त्रीकृतलोकस्य एका द्वारों का (तोरणाणं) तोरणों का (दीवाण) द्वीपों का (समुदाण) संमुद्रों का (आयामविक्खं भोच्चत्तोवेहपरिक्खेवा माविज ति) आयाम, विष्कंभ, उच्चत्व, उद्वेधभूमि के बीच अवगाह, परिधि-परिक्षेप ये सब मापे जाते हैं। तात्पर्य यह कि-'प्रमाणांगुल से पूर्वोक्त पृथिवी आदिकों के आयाम आदि का प्रमाण जाना जाता है। (से समासओ तिविहे पण्णत्ते) यह प्रमाणांगुल संक्षेप से तीन प्रकार का कहा गया है-(तं जहा) वे प्रकार ये है-(सेढी अंगुले, पयरंगुले, घणंगुले) श्रेण्यं गुल, प्रतरांगुल और घनांगुल । (असंखेज्जाओ जोयणकोडा. कोडीओ सेढी) प्रमाणांगुल से निष्पन्न हुए असंख्यात कोड़ा कोडी योजनो की एक श्रेणि होती है । एक करोड को एक करोड से गुणा करने पर जो संख्या आती है, उसका नाम कोडा कोडी है। जो योजन प्रमाणांगुल से निष्पन्न होता है वही योजन यहाँ लिया गया विखंभोच्चत्तोव्वेहपरिक्खेवा माविज्जति) मायाम, वियप, Gध ભૂમિમધ્યાવગહ-પરિધિ-પરિક્ષેપ આ સર્વે માપવામાં આવે છે તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે પ્રમાણુગલથી પૂર્વોક્ત પૃથિવી વગેરેના આયામ વગેરેનું પ્રમાણ नामा भावे छे. (से समासओ तिविहे पण्णत्ते) या प्रमाणiya सपथी १ रन अपामा मान्य छे. (तंजहा) a प्र म प्रभारी के (सेढी, अंगुले, पयरंगुले, घणंगुले) श्रेय ४३, प्रशुल भने धनांशी (असंखेनाओ जोयणकोडाकोड़ीओ सेढी) प्रभाविथा निपन्न थथे अस. ખ્યાત કોડાકોડી ચેજનાની એક શ્રેણી થાય છે. એક કરોડને એક કરોડ વડે ગુણિત કરવાથી જે સંખ્યા થાય છે, તેનું નામ કેડા-છેડી છે જે જન પ્રમાણગુલથી નિષ્પન્ન થાય છે, તેજ જૈન અહીં ગ્રહણ કરવામાં આવેલ છે. એવા યોજના અસંખ્યાત કેડા-કેડી સંવતિત ચતુરસ્મીત લેની એક શ્રેણું કહેવાય છે. *
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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