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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १९७ पृथ्वीकायिकादीनां शरीरावगाहनाति.. . नारकासुरकुमारादिष्वपि अपर्याप्तभेदतोऽवगाहना कस्मानोक्ता ? इति चैदाहनारकामुरकुमारादयो हि सर्वेऽपि लब्धिसम्पन्नत्वात् पर्याप्ता एव भवन्ति नत्वपयाँता, अतोऽपर्याप्तत्वलक्षणस्य प्रकारान्तरस्य तेष्वसभवानभेदतोऽनगाहना चिन्त्य तें, इति। अथ द्वीन्द्रियादिपदेऽवगाहनामानं प्ररूपयितुमाह-'बेइंदियाष पुरवा इत्यादि अनौधिकद्वीन्द्रियाणामपर्याप्ताना पर्याप्तानां चेति स्थानत्रयेश्वगाहमा शंका-यदि इस प्रकार से अवगाहना प्रमाण में भेद स्वीकार किण जाता है तो फिर नारक, असुरकुमार आदि में भी अपर्याप्त की अपेक्षा लेकर अवगाहना प्रकट करनी चाहिये थी-परन्तु वहाँ इस रूप से अवगाहना तो कही नहीं है-सो इसका क्या कारण है? उत्तर-नारक एवं असुरकुमार आदि सब पर्याप्त लब्धिसंपन्न होते के कारण पर्याप्त ही होते हैं अपर्याप्तक नहीं। इसलिये अपर्याप्तस्वरूप प्रकारान्तर को लेकर वहां अवगाहनाका मान प्रकट नहीं किया गया है। क्योंकि इस प्रकारान्तर की वहां संभावना ही नहीं है। अब.. सूत्रकार द्वीन्द्रियादि पद वाच्य द्वीन्द्रियादि जीवों में अगाहना के मान को प्रश्नोत्तर पूर्वक प्रकट करते हैं-(बेईदियाणं पुच्छा गोयमा जहनेणं अंगुलस्स असंखेज्जइ भागं उक्कोलेणं पारस जोयणाई.) प्रश्न-हे भदन्त । बीन्द्रिय जीवों में अवगाहना कामान कितना है।" ભાગ પ્રમાણ છે અને ઉત્કૃષ્ટ અવગાહનાનું પ્રમાણ સમુદ્ર વગેરેમાં, ઉન્મ ये भरावती अपेक्षा ४.४४.१धारे: .8MR. यानरः छ। શકા-જે આ પ્રમાણે અવગાહના પ્રમાણમાં ભેદ સ્વીકાર કરવામાં આવે છે તો પછી નાર, અસુરકુમાર વગેરેમાં પણ અપર્યાપ્તકની અપેક્ષાથી અલગ ७.५८ ४२वी नती ती... त्यात ३५भ: म पामा मापी नथी, तो भानु शु. १२५. छ:१ ઉત્તર-નારક અને અસુરકુમાર વગેરે સર્વ પયસ લધિસંપન્ન રહેવાથી પર્યાપ્ત જ હોય છે, અપર્યાસક હતા નથી એટલા માટે પર્યાપ્તક રૂપ પ્રકારાતર લઈને ત્યાં અવગાહનાનુંમાન પ્રકટ કરવામાં આવ્યું નથી કેમ કે આ પ્રકાર રાન્તરની ત્યાં સંભાવના જ નથી. હવે સૂત્રકાર દ્વીન્દ્રિયાદિ પદવાઓ કૉમિ याहम अपनानाभान मनोत्तरपूर. घट ४३ छ. (बेइंदियाणं पुच्छा, गोयमा, जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं उक्कोसेणं बारस जोयणाई) પ્રશ્ન-હે ભદતા હીન્દ્રિય માં અવગાહનાનુંમાન કેટલું છે?"
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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