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________________ १६२ अनुयोगद्वारसूत्रे सम्भव्यपि विज्ञेयम् । अत्र ओघतो विशेषतश्च द्विविधशरीरात्रगाहनाया जघन्यो'त्कृष्टप्रमाणमुक्तं तत् सुविज्ञेयतया न व्याख्यायते । विशेषश्चात्रेदं बोध्यम् - उत्कृ शवगाहना सर्वास्त्रपि पृथिवीषु स्वकीयस्वकीयचरमप्रस्तटेषु भवति । भवधारणीयायावोत्कृष्टायाः सकाशादुत्तरवै क्रिया सर्वत्र द्विगुणा बोध्या । इत्थं नैरयिकाणां वैक्रिय अवगाहना जो है, वह जघन्य से अंगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण और उत्कृष्ट से ३१ धनुष तथा १ रत्नि प्रमाण है । (वालुयप्पहा पुढवीए जेरइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णत्ता १ ) हे भदन्त ! तीसरी पृथिवी वालुकाप्रभा में नारकियों के शरीर की अवगाना कितनी है ? उत्तर- (गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता) गौतम ! दो प्रकार की है। (तं जहा ) वे प्रकार ये हैं- ( भवधारिणिज्जा य उत्तर वे उब्विया य ) एक अवधारणीय और दूसरी उत्तरविक्रिया । (तत्थ णं जा सा भवधारणिज्जा सा जहणणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उक्कोसेणं एकतीसं धणूइं इक्करयणीय) भवधारणीय अवगाहना जघन्य से अंगुल के असंख्यातवें भाग. प्रमाण, और उत्कृष्ट से ३१ धनुष और १ रनिप्रमाण है । (तत्थ णं जासा उत्तरवेउच्विया सा जहणणेणं अंगुलस्त संखेज्जइभागं उक्को सेणं बासट्ठि धणूइं दो रयणीभो य) उत्तरवेक्रिय अवगाहना जघन्य से अंगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण, और उत्कृष्ट से ६२ धनुष दो रहिन प्रमाण है । ( एवं सव्वासिं पुढवीणं पुच्छा भाणियन्त्रा) इसी प्रकार से ઉત્તરવૈક્રિય જેય અવગાહના જઘન્યથી અંગુલના સખ્યાતમા ભાગ પ્રમાણુ અને उत्कुष्टथी ३१ धनुष तेम १ रत्न प्रभाणु छे. ( बालुयप्पहा पुढवीए णेरइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णत्ता १) हे लहांत ! त्री વાલુકા પ્રભામાં નારકીઓના શરીરની અવગાહના કેટલી છે ? पृथिवी उत्तर- (गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता) गौतम मे अमरनी छे. (तंजा) ते प्रहारीमा प्रभाव थे. ( भत्रधार णिज्जा य उत्तरवेउब्विया य) ४ अवधारणीय मने भी उत्तरखैडिया (तत्थ णं जा खा भवधारणिज्जा सा जहण्णेणं अंगुलस्स असं खेज्जइभागं, उक्कोसेणं एक्कतीसं धणूइं इक्करयणी य) लवधारीय अवजाહતા જધન્યથી અ’ગુલના અસખ્યાતમાં ભાગ પ્રમાણુ ઉત્કૃષ્ટ ૩૧ ધનુષ અને ૧ નિ પ્રમાણ છે (तत्थ णं जा खा उत्तरवेउव्विया खा जहणेणं अंगुलरख संखेज्जइभागं उक्कोसेणं बासट्ठि धणूईं दो रयणीओ य ) उत्तर वैडिय અવગાહના જઘન્યથી અશુલના સખ્યાતમાં ભાગ પ્રમાણુ અને ઉત્કૃષ્ટથી ६२ धनुष मे शन प्रभाष छे. (एवं सव्वासिं पुढवीणं पुच्छा भाणियव्वा ) .
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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