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________________ १५० अनुयोगद्वारसूत्रे माध्यते' इत्युक्तम् । तत्र तेषां शरीरावगाहना क्रियन्ती भवति ? इति जिज्ञासितुकामः पृच्छति - 'रइयाणं अंते' इत्यादि । हे भदन्त | नैरविकाणां-नारकजीवानां शरीरावगाहना - अवगाहन्ते = अवतिष्ठन्ते जीवा अस्यामिति अवगाहना=नारकादि तनुसमत्रगाढं क्षेत्रं नारकादितन्नुरेव ना, शरीरस्यावगाहना शरीरमेव वा अवगाहना सा कियन्महती = कियत्ममाणा पज्ञता = मरूपिता भवताऽन्यैश्व तीर्यकृद्भिरिति गौतमस्वामिनः प्रश्नः । उत्तरयति भगवान् हे गौतम! नैरयिकाणां शरीरावगाहना भवधारणीया उत्तरबैंकियेति द्विविधा पज्ञप्ता । तत्र भवे =नारकादिपर्यायभवनलक्षणे आयुः - समाप्ति यावत् या सततं धियते सा भवधारणीया शरीरावगाढना - में कहा है-उस विषय में गौतम पूछते हैं कि ( णेरइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णत्ता ) हे भदन्त । नारक जीवों के शरीर की आप ने तथा अन्य तीर्थकरों ने अवगाहना कितनी कही है ? उत्तर- ( गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता ) हे गौतम! नारक जीवों के शरीर की अवगाहना दो प्रकार की कही गई है । जिसमें जीव रहे, उसको नाम 'अवगाहना ' है । नारक आदि के शरीर में अवष्टब्ध जो आकाशरूप क्षेत्र है वह अथवा नारक आदि जी का जो शरीर है वह अवगाहना है, ऐसा इस अवगाहना शब्द का निष्कर्षार्थ है । यह दो प्रकार की कही गई है- एक अवधारणीय, और दूसरी उत्तर वैक्रिय । जो अवगाहना नरकादि पर्याय रूप भव में अपनी २ आयु की समाप्ति पर्यन्त धारण की जाती है वह भवधारणीय अवगाहना है । तथा जो स्वाभाविक शारीरिक अवगाहना के बाद किसी कार्य के वश से वामां भव्यु छे, ते संबंधां गौतम स्वामी प्रश्न पुरे छे ! ( रइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णत्ता) हे लहांत | नार જીયાના શરીરની આપશ્રીએ તેમજ બીજા તીર્થંકરાએ અવગાહના કેટલી કહી છે ? उत्तर- (गोयमा ! दुविधा पण्णत्ता) हे गौतम ! नार भवाना शरीरनी અવગાહના બે પ્રકારની કહેવામાં આવી છે. જેમાં જીવ રહે છે, તેનું નામ અગાહના છે નરક વગેરેના શરીરથી અવષ્ટબ્ધ જે આકાશ રૂપ ક્ષેત્ર છે, તે અથવા નારક વગેરે જીવાનુ જે શરીર છે તે અવગાહના છે, એવા આ અવગ હુંના શબ્દના નિષ્કર્ષો છે. આ એ પ્રકારની કહેવામાં આવી છે એક ભવધારણીય અને બીજી ઉત્તરવૈક્રિય જે અવગાહના નરકાદિ પય રૂપ ભવમાં પાતપાતાના આયુની સમાપ્તિ સુધી ધારણ કરવામ આવે છે, તે લવધારણીય અવગાહના છે તેમજ જે સ્વાભાવિક શારીરિક અવગાડુના પછી કોઈ
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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