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________________ अनुयोगमा विरूपः कुत्सितो भङ्गो विभङ्गः, स एव ज्ञान-विभङ्गज्ञानम्-ज्ञानत्वं चास्य अर्थपरिया नात्मकत्वाद् बोध्यम् । मिथ्याष्टिदेवादेरवधिज्ञानं विभङ्गज्ञानमुच्यते । विभज्ञानस्य लब्धिः विभङ्गज्ञानलब्धिः। इयमपि स्वावरणक्षयोपशमेनैव भवति, अतोऽस्या अपि क्षायोपशमिकीत्वं बोध्यम् । एवं मिथ्यात्वादिकर्मणः क्षयोपशमसाध्याः शेषा अपि सम्यग्दर्शनादिलब्धयो यथासम्भवं भावनीयाः। तथा-क्षायोपशमिकी वीर्यलन्धिःइयं हि वीर्यान्तरायकर्मक्षयोपशमाद भवति। एवं-पण्डितवीर्यलब्धिः, बालवीर्यलन्धिः, चक्खुदंसणलद्धी) क्षायोपशमिकीचक्षुः दर्शन लन्धि, (अचक्खुदंसणालद्धी, ओहिदंसणलद्धी) अचक्षुदर्शनलब्धि अवधिदर्शनलब्धि है। इन में चक्षुर्दर्शनावरण के क्षयोपशम से चक्षुर्दर्शन लब्धि, अचक्षुर्दर्शनावरण के क्षायोपशम से अचक्षुर्दर्शनलब्धि और अवधिदर्शनावरण के क्षयोपशम से अवधिदर्शनलब्धि होती है। (एवं सम्मदसणलद्धी, मिच्छादंसूणलद्धी सम्ममिच्छादसणलद्धी) इसप्रकार से सम्पदर्शनलब्धि, मिथ्या. दर्शनलब्धि (खोवसमिया सामाइयचरित्तलद्धी, एवं छेयोवट्ठावणलद्धी, परिहारविसुद्धिलद्धी सुहमसंपरायचरित्तलन्धि एवं चरित्ताचरित्तलद्धी) क्षायोपशमिकी सामायिक चरित्रलब्धि छेदोपस्थापनालन्धि, परिहारवि शुद्धिक लन्धि, सूक्ष्म संपरायचारित्रलब्धि, चारित्राचरित्रलब्धि (खओव समिया दाणलद्धी, एवं लाभलद्धी, भोगलद्धी, उपभोगलद्धी) क्षायोपश मिकी दानलब्धि लाभलब्धि, भोगलब्धि उपभोगलब्धि, (खोवसमिया ___ (खओवसमिया चखुदसणलद्धी) क्षायो५भिडी यक्ष: Aalou, (अवखुदसणलद्धी, ओहिदसणलद्धी) अयक्षुशनसधि भने साधन પણ ક્ષયોપશમ નિષ્પન્ન ક્ષાયોપથમિક ભાવરૂપ છે, કારણ કે ચક્ષુદર્શનાવરણ કમના ક્ષય પશમથી ચક્ષુદર્શનલબ્ધિની પ્રાપ્તિ થાય છે, અચહ્યુશનાવરણ કર્મના ક્ષયે પશમથી અચક્ષુર્દશનલબ્ધિની પ્રાપ્તિ થાય છે અને અવધિદર્શના १२ना क्षयोपशमयी मधिशनल प्राप्ति थाय छे. (एव सम्मखणलद्धी, मिच्छादसणलद्धो, सम्ममिच्छादसणलद्धी) मे प्रभार सभ्ययन , मिथ्या नDिU, सभ्यभूमिथ्याशन, :(ख पोवसमिया सामाइयवरितलद्धी, एवं छेयोवद्रावणलद्धी, परिहारविसुद्धिउद्धो) क्षायो५मिती सामावि यारिधि , छे।५२थापनासन्धि, प२ि७२विशुद्धि04, (सुहमसंपराय चरितलद्धी, एवं चरित्ताचरित्तलद्धी) सुभ ५२॥4 Aaalou, यात्रा यात्रिalu, (ख ओवसमिया दाणलद्धी, एवं लाभलद्धी, भोगलद्धी, उपभोगली) શ્રાપથમિકી દાનલબ્ધિ, લાભલબ્ધિ, ભેગલબ્ધિ અને ઉપગલબ્ધિ (खभोवममिया वीरियलबी) क्षायति वाय', (एवं पंडियवीरियसनी,
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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