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________________ मेनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १५५ क्षायोपमिकभावनिरूपणम् प्राप्तिहिं तत्चदावरणकर्मक्षयोपशमजन्या बोध्या। केवलज्ञानलब्धिस्तु तदावरण कर्मणः क्षय एवोत्पद्यते अतोऽत्र नोक्ता। तथा-क्षायोपशमिकी मत्यज्ञानलन्धिःअंशानं-कुत्सितं ज्ञानम्-भज्ञानम्, कुत्सार्थेऽपि नोवृत्तिः, कुत्सितं-शीलम्अशीलम् इत्यादौ तथा दृष्टत्वात् , मतिरेवाज्ञानं मत्यज्ञानं तस्य लब्धिः योग्यता स्वावरणक्षयोपशमेनैव निष्पद्यते । कुत्सितत्वं चास्य मिथ्यादर्शनोदयदक्षितत्वाद बोध्यम् । एवं क्षायोपशमिकी श्रुतज्ञानलब्धिरपि बोध्या। तथा-क्षायोपशमिकी विभङ्गमानलब्धिः भङ्गमकारो भेदइति पर्यायाः। भङ्गशब्दस्त्विह प्रक्रमादवधिवाचकः। ज्ञानालन्धि अवधिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से होती है, और मनापर्यवज्ञानलब्धि मनः पर्यवज्ञानावण कर्म के क्षयोपशम से होती है। इसलिये इन लब्धियों कोक्षायोपशमिक कहा है। केवलज्ञानलब्धि को सूत्रकार ने जो यहां नहीं कहा है उसका कारण यह है कि यह केबलज्ञानावरणकर्म के क्षय से होती है। (खओवसमिया मह अण्णाण लद्धी, खोवसमिया सुय अण्णाणलद्धी, खोवसमिया विभंगणाण. लद्धी) मतिअज्ञानावरण के क्षयोपशम से मति अज्ञान, श्रुतअज्ञानाघरण के क्षयोपशम से श्रुतज्ञान, विभंगज्ञानावरण के क्षयोपशम से विभंगज्ञान की प्राप्ति होती है, इसलिये इन्हें क्षायोपशिमिकी मत्यज्ञान लब्धि, क्षायोपशमिकी श्रुताज्ञानालब्धि और क्षायोपशमिकी विभंग ज्ञान लब्धि कहा है । कुत्सित ज्ञान का नाम अज्ञान है । कुत्सित अर्थ में भी नव होता है। जैसे कुत्सितशील अशील आदि (खोवसमिया અવધિજ્ઞાન લબ્ધિની અને મન:પર્યવજ્ઞાનાવરણના ક્ષય પશમથી મન:પર્યવજ્ઞાન લબ્ધિની પ્રાપ્તિ થાય છે. તે કારણે તે લબ્ધિઓને ક્ષયપશમિક કહેવામાં આવી છેઅહીં સૂત્રકારે કેવળજ્ઞાન લબ્ધિને ઉલ્લેખ કર્યો નથી, કારણ કે કેવળજ્ઞાનાવરણ કર્મના ક્ષયથી જ કેવળજ્ઞાન લબ્ધિની પ્રાપ્તિ થાય છે, પશમથી તેની પ્રાપ્તિ થતી નથી. (खोवसमिया मइ अण्णाणलद्धी, ख प्रोवसमिया सुय अण्णोणलद्धी, खोवसमिया विभंगणाणलद्धी) भति मज्ञाना२ना क्षयोपशमयी मति अज्ञान, શ્રતઅજ્ઞાનાવરણના ક્ષયોપશમથી શ્રતાજ્ઞાન અને વિસંગજ્ઞાનાવરણના ક્ષપશમથી વિર્ભાગજ્ઞાનની પ્રાપ્તિ થાય છે. તેથી તેમને ક્ષાપશમિકી મત્યજ્ઞાનલબ્ધિ, લાપશમિક કૃતાજ્ઞાનલબ્ધિ અને ક્ષાપશમિકી વિલંગણાનલબ્ધિ કહેવામાં આવેલ છે. કુત્સિત જ્ઞાનનું નામ અજ્ઞાન છે. કુત્સિતના અર્થમાં પણ न१ (२ वाय) । प्रयोग थाय छे. म है पुत्सिdula, Mala मालि.
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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