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________________ ५७६ भनुयोगद्वारा यैवाभावादिति । नानाद्रव्याणि प्रतीत्य तु आनुपूर्वीद्रव्याणां सर्वादासर्वका स्थिति र्भवति । लोकस्य प्रत्येकस्मिन् प्रदेशे तेषां सर्वदा सद्भावात् । तथा-नैगमव्यवहारसम्मतानि अनानुपूर्वीद्रव्याणि काळतः कियच्चिरं भवन्ति तिष्ठन्ति ? इति प्रश्नः । उत्तरयति - एकं द्रव्यं घतीत्य अजघन्यानुत्कर्षेण एकं समयं तिष्ठन्ति । रहता ही नहीं है। ( नागादव्बाई पडुच्च सन्वद्रा) तथा नाना आनुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा को आश्रित करके आनुपूर्व द्रव्यों की स्थिति सार्वकालिक है। क्योंकि लोक के प्रत्येक प्रदेश में नाना आनुपूर्वी द्रव्यों का सद्भाव रहता है (णेगमबवहाराणं ) नैगमव्यवहारनयसंमत (अणाणुgodioवाई ) समस्त अनानुपूर्वी द्रव्य ( कालओ) काल की अपेक्षा से (haraj ) कितने समय तक रहते हैं। उत्तर- ( एगं दत्रं पडुच्च ) एक अनानुपुर्वीद्रव्य की अपेक्षा करके- (अजहन्नमणुक कोसेणं) अनानुपूर्वीद्रव्य अजघन्य और अनुत्कर्ष से एक समय तक रहते हैं (नाणादव्वाई पडुच्च सव्वद्धा) और नाনद्रव्यों की अपेक्षा करके समस्त अनानुपूर्वी द्रव्य सर्वकाल रहते है । क्योंकि लोक के हरएक प्रदेश में इनका सद्भाव रहता है। (अवत्तव्वगद -व्वाणं पुच्छा) अवक्तव्यकद्रव्यों के विषय में भी इसी प्रकार से प्रश्न हैं कि नैगमव्यवहारनयसंमत अवक्तव्यक द्रव्य काल की अपेक्षा से कितने समय तक रहते है ? (नादव्वाइं पहुच्च सव्वद्धा) भने मानुपूर्वी द्रव्योनी अपेक्षाखे વિચાર કરવામાં આવે, તેા આનુપૂર્વી દ્રવ્યેની સ્થિતિ સાવ કાલિક છે, કારણ કે લેાકના પ્રત્યેક પ્રદેશમાં વિવિધ આનુપૂર્વી દ્રન્યાના સદા સદ્ભાવ જ રહે છે. प्रश्न- (गमववहाराणं) नेगमव्यवहार नयस'भत (अणाणुपुत्रीदव्बाई) समस्त मनानुपूर्वी द्रव्येो (कालओ) अजनी अपेक्षाओ (केवम्बिरं) डेंटला સમય સુધી રહે છે ? उत्त२–(एगं दव्वं पडुन्च) मनानुपूर्वी द्रव्यनी अपेक्षाको वियाएं ४२वामां आवे तो (अजहन्नमणुकोसेणं) मनानुपूर्वी द्रव्य धन्य भने अनु. दृष्ट अजनी अपेक्षाओ मे समय सुधी रहे छे. (नाणा हव्वाई पद्दुच्च सव्वद्धा) અને અનેક દ્રબ્યાની અપેક્ષાએ વિચાર કરવામાં આવે તે અનાનુપૂર્વી દ્રવ્યેની સ્થિતિ સાવ ક લિક છે, કારણ કે લેાકના દરેક પ્રદેશમાં તેમના સદ્ભાવ રહે છે. प्रश्न- (अवत्तगव्वाणं पुच्छा) भवक्तव्य द्रव्याना विषयभांप हो પ્રશ્ન પૂછવામાં આવ્યે છે કે નૈગમવ્યવહાર નયસ'મત અક્તવ્ય દ્રવ્ય કાળની પેક્ષાએ કેટલા સમય સુધી રહે છે?
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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