SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 430
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सोचन्द्रिका टीका सूत्र ९६ अनुगमस्वरूपनिरूपणम् ४१७ मा क्षेत्र निरूपयितुमाह-'संगहस्स आणुपुब्बोदबाई लोगस्स कहभागे होना!' इलादि-संग्रहनयसम्मतानि आनुपूर्वीद्रव्याणि लोकस्य कतिभागे-कियद्भागे मान्ति ! कि संख्पेयतमभागे भवन्ति ? किमसंख्येयतमभागे भवन्ति ? किं संख्येयेषु मागेषु भवन्ति ? किमसंख्येयेषु भागेषु भवन्ति ? किं सर्वलोके भवन्ति ? इति जः। उत्तरमाह-संग्रहनयसम्मतानि आनुपूर्वीद्रव्याणि लोकस्य संख्येयतमभागे नो भवन्ति, अपपेयतमभागे नो भवन्ति, संख्येयेषु भागेषु नो भवन्ति, असंख्ये. येषु भागेषु चापि नो भवन्ति, किन्तु नियमान् सर्वकोके भवन्ति । आनुपूर्वी. सामान्यस्यै कत्वात् म भोव्यापित्वाच्च नियमात सर्वलोके तत्सत्ता बोध्या । अब मूत्रकार क्षेत्र का निरूपणा करते हैं प्रश्न- (संगहम्ल आणुपुब्धी दवाई लोगस्स कहभागे होज्जा ?) संग्रहनय संमत समस्त आनुपूर्वी द्रव्य लोक के कितने भाग में हैं? (किं संखेज्जहभागे होज्जा, असंखेन्जहभागे होज्जा, संखेज्जेसु भागेसु होज्जा? असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा ? सव्वलोए होज्जा ! )क्या लोक के संख्यातवें भाग में हैं ? या लोक के असंख्यातवें भाग में हैं? या लोक के संख्यान भागो में है ? या लोक के असंख्यात भागों में है या सर्वलोक में हैं ? उत्तर-(नो मखेज्जहभागे होज्जा, नो असंखेज्जाभागे होज्जा, नो संखेज्जेसु भागेसु होजना, नो असंखेन्जेप्सु भागेसु होज्जा, निय. मा सवलोए होजना, एवं दोनिवि ) समस्त आनुपूर्वी द्रव्य लोक के न संख्यातवें भाग में हैं न अत ख्यातवे भाग में हैं, न संख्यात भागों में हैं और न अमंल्यात भागों में हैं किन्तु नियम से समस्त लोक में है। प्रश्र-(संगहास आणुपुब्धीदवाई लोगस्स कहभागे होता ) 31 पन् । सनयमान्य मानुषी द्रव्ये ना ४८सा मामा ? (किं संखेजइभागे होना, असंखेजइभागे होज्जा, संखेज्जेसु भागेस होज्जा, असं बेज्जेसु भागेसु होज्जा, सव्वलोप होज्जा । शुना सध्यातमा भागमा ? કે અસંખ્યાતમાં ભાગમાં છે? કે લેકના સંખ્યાતભાગોમાં છે! કે લોકના અસંખ્યાત ભાગમાં છે કે સર્વ લેકમાં છે? उत्तर-(नो संखेज्जइभागे होज्जा, नो असंखेज्जइभागे होम्जा, नो संखेज्जेसु भागेसु होजा, नो असंखेम्जेसु भागेसु होज्जा, नियमा सवलोए होता, एवं दोन्नि वि) समस्त मानुषी द्रव्य वन संज्यातमा भागमा ५९ नका, અખાતમાં ભાગમાં પણ નથી, સંખ્યાત ભાગોમાં પણ નથી, અસંખ્યાત લાગોમાં પણ નથી, પરંતુ નિયમથી જ સમસ્ત લેકમાં છે, કારણ કે આન
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy