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________________ gee माणुपुद्गलाश्च आनुपूर्वीच अनानुपूर्वीच ४ । अथवा-त्रिमदेशिकाश्च द्विपदेशिकाय मानुपूर्वीच अवक्तव्यकं च ५। अथवा-परमाणुपुद्गलाश्च द्विपदेशिकाश्च अनानुपूर्वीच भवक्तव्यकं च ६ । अथवा-त्रिपदेशिकाश्च परमाणुपुद्गला श्च द्विपदेशिकाश्च आमु. पूर्वी च अनानुपूर्वी च अवक्तव्यकं च ७ । सैषा संग्रहस्य भङ्गोपदर्शनता।मु०९४॥ टीका-'एयाएणं' इत्यादि। अत्रापि सप्त भङ्गा वोध्याः। अस्य सूत्रस्य व्याख्याकृतमाया ३ ॥० ९४॥ अथ समवतार प्रदर्शयति मूलम्-से किं तं संगहस्स समोयारे? संगहस्त समोयारेसंगहस्त आणुपुत्वीदनाई कहिं समोयरंति ? किं आणुपुठवी. दहिं समोयरंति ? अणाणुपुत्वीदव्वेहिं समोयरंति ? अवत्त बगदव्वेहिं समोयरंति ? संगहस्म आणुपुबीदव्वाइं आणुपुत्रीदव्वेहिं समोयरंति नो अणाणुपुत्वीदव्वेहिं समोयरंति नो मनानुपूर्षी इस शब्द के वाच्यार्य से यावन्मात्र परमाणु पुद्गल है वे सप अनानुपूर्वी इस एक पद से संगृहीत हो जाते हैं । (दुप्पएसिया अवसउवए) इसी प्रकार यावन्मात्र दिप्रदेशी कंध हैं वे एक अवक्तव्यक हैं इस प्रकार अवक्तव्यक इस शब्द के वाच्यार्थ से यावनमात्र विप्रदेशी स्कंध हैं वे सब अवक्तव्यक इस एक शब्द से संगृहीत हो जाते हैं। इसी प्रकार से दिसंयोगी तीन पदों का और त्रिसंयोगी १ एक पद का भी वाच्यार्थ समझ लेना चाहिये । इसी विषय को सूत्रकार ने 'अहवा' भादि पदों द्वारा कहा है इन समस्त पदों की व्याख्या पहिले की जा पुकी है। ॥ सू० ९४ ॥ पुब्बी) २८i ५२मा पुल छे, तो ये अनानुरवी' ३५ है. मा રીતે સમસ્ત પરમાણુ પુદ્ગલેને અહીં અનાનુપૂર્વી પદના વાગ્યાથ રૂપે ગ્રહણ पामा भावेस. (दुप्पएसिया अव्वत्तव्यए) Reai विशी १४ , તેઓ એક અવક્ત૫ક રૂપ છે. આ રીતે “અવક્તવ્યક” આ પદને વાગ્યાથી સમસ્ત દ્વિદેશી કહે છે તેથી “ અવક્તવ્યક” આ એક પદના પ્રયોગ દ્વારા સમસ્ત દ્વિદેશી & ગ્રહણ થઈ જાય છે. એ જ પ્રમાણે દ્વિસંગી ત્રણ ભાંગાઓને અને ત્રિસંયોગી એક ભાંગાનો વાગ્યાથે પણ भO a ४२. मा. विषयनु सूत्ररे " महवा " He alsत प| લાશ કથન કર્યું છે. આ બધા ની વ્યાખ્યા પહેલાં આપવામાં जावी सुडी है. ॥२०४॥
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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