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________________ ४०७ पोनिका टीका स्म ९४ भङ्गोपदर्शनतानिरूपणम् गया-तपा खलु संग्रहस्य भासमुत्कीर्चनतया कि प्रयोजनम् १ एतथा सख संग्रहस्य मंगसमुत्कीर्तनतया संग्रहस्य भनोपदर्शनता क्रियते। अथ का सा संबहस्य भनोपदर्शनता? संग्रहस्य भोपदर्शनता त्रिप्रदेशिका आनुपूर्वी१ परमाजुपुद्गला अनानुपूर्वी २, द्विपदेशिका अवक्तव्यम् ३ । अथवा-त्रिप्रदेशिकाश्च पर अप मूत्रकार भंगोपदर्शनता का कथन करते हैं"एमाएणं संगहस्स" इत्यादि। शब्दार्थ- ( एयारणं मंगहस्स भंगसमुक्तित्तणयाए कि पओयणं) हे भदन्त संग्रहनय मान्य इस भंगसपुरकीर्तनता से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? उत्तर- (एयाएणं संगहस्स समुक्त्तिणयाए भंगोवदंमगया कीरइ) संग्रहनय मान्य इस भंग समुत्कीर्तनता से संग्रहन य मान्य भंगोपदर्श नता दिखलाह जाती है। ( से किं तं मंगहस्म भंगोवदंमणया ? )हे भदन्त ! संग्रनय मान्य भगोपदर्शनता क्या है ? उत्तर-(संगहस्स भंगोषदंसणया) संग्रहनय मान्य भंगोपदर्शनता यह है (तिप्पएसिए आणुपुग्वी) यावन्मात्र त्रिप्रदेशी स्कन्ध है वे एक. १ आनुपूर्वी है। इस प्रकार भानुपूर्वी इस शब्द के वाच्यार्थ से यावन्मात्र त्रिप्रदेशी स्कंध हैं वे सब संगृहीत हो जाते हैं। (परमाणुपोग्गला अणा. णुपुव्वी) यावन्मात्र परमाणु पुद्गल हैं वे एक अनानुपूर्ण हैं- इस प्रकार હવે સૂત્રકાર ભંગ પાર્શનતાનું નિરૂપણ કરે છે– " एयाएण संगहस्य" - -(एयारण मंगहस्स भंगसमुचित्तणयाए किं पओयण? 4 વન ! સંગ્રહનયમાન્ય આ લંગસમુત્કીર્તનતા વડે કર્યું પ્રયોજન સિદ્ધ થાય છે? उत्तर-( एयाएण संगहस्स भंगसमुझित्तण पाए संगहस्स भंगोवदंशणया कीरह) સંગ્રહનયમાન્ય આ ભંગસમુત્કીર્તનતા વડે સંગ્રહનય માન્ય ભંગોપદર્શનતા मताभ भावे. (से कि त संगहस्स भंगोवदंपणया ?) से समपन् । સંગ્રહનયમાન્ય ભંગ ૫દર્શનતાનું કેવું સ્વરૂપ છે? उत्तर-(संगहस्स भंगाबदसणया) सनयमान्य सोपानतानु સ્વરૂપ આ પ્રકારનું છે– (सिप्पएसिया पाणुपुयी) २२सा विशी २७ , तेरो આવ રૂપ છે. આ રીતે જેટલા વિદેશી કંપે છે તેમને અહીં આનyी Aurt पा२याय ३२ ३४५२१ मे. (परमाणुपोग्गठा अणाणु
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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