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________________ अनुगोगचन्द्रिका टीका सूत्र ७५ अनौपनिधिकीद्रव्यानुपूर्वी निरूपणम् ३०९ शिकस्कन्धो यावत् दशपदेशिकः आनुपूर्वी बोध्या यावत् संख्यातप्रदेशिक आनु पूर्वी, असंख्यातप्रदेशिकः आनुपूर्वी, अनन्तप्रदेशिकः आनुपूर्वी बोध्या। परमाणुपुद्गलः एकः परमाणुस्तु अनानुपूर्वी बोध्या। परमाण्वन्तरा-संस्पृष्टत्वात् , द्विपदेशिका परमाणुद्वयविभागवान् स्कन्धस्तु भानुपूर्वितया अनानुपर्वितया वा वक्तुमशक्या, अतः सोऽवक्तव्यकः। यस्मादेवं तस्मात्-त्रिमदेशिकाः सर्वेऽपि स्कन्धा आनुपूयॊ भवन्ति, यावत् अनन्तमदेशिकाः सर्वेऽपि स्कन्धा आनुपूर्यों भवन्ति । पुथ्वी संखेज्ज पएसिए आणुपुची, असंखिजपएसिए आणुपुज्वी, अणंतपएसिए आणुपुठवी) तीन प्रदेशोंवाला व्यणुक स्कंध आनुपूर्वी है चार प्रदेशोंवाला चतुष्प्रदेशिक स्कंध आनुपूर्वी है। यावत् दश प्रदेशोंवाला स्कंध आनुपूर्वी है यावत् संख्यातप्रदेशोंवाला स्कंध आनुपूर्वी है, असंख्य प्रदेोवाला स्कंध आनुपूर्वी है। ऐसा जानना चाहिये। (परमाणुपोग्गले आणाणुपुव्वी, दुपएसिए अवत्तव्यए) परन्तु जो एक परमाणु है वह आनुपूर्वी नहीं है। क्योंकि वह और किसी दूसरे परमाणु से संस्पृष्ट नहीं है। द्विप्रदेशवाला जो स्कंध है वह आनुपूर्वी रूप से और अनानुपूर्वी रूप से वक्तुं अशक्य है इसलिये वह अवक्तव्य है। जब ऐसी बात है तो (तिपएसिया आणुपुत्वीओ जाव अणंतर एसि. याओ आणुपुञ्चीओ) तीन प्रदेशवाले समस्तस्कंध आनुपूर्वी हैं-यावत् अनन्त प्रदेशवाले जितने भी स्कंध हैं वे सब आनुपूर्वियां है । (परमाणु आणुपुञ्ची, संखेज्जपएसिए आणुपुत्री, असंखिज्जपएसिए आणुपुव्वी, अणंत परमिए आणुपुब्बी) ३५ प्रशोपागे। व्या४ २४५ भानुभा छे, या२ प्र. શેવાળે ચતુuદેશિક સ્કંધ આનુપૂર્વી છે, દસ પર્યન્તના પ્રદેશેવાળો કંધ આનુપૂર છે, સંખ્યાત પ્રદેશે.વાળો સ્કંધ આનુપૂવી છે, અસંખ્યાત પ્રદેશેવાળો સ્કંધ આનુપૂર્વી છે અને અનંત પ્રદેશેવાળો સ્કંધ આનુપૂર્વી છે, એમ સમજવું (परमाणुगोग्गळे अणाणुपुल्वी, दुपएसिए अवत्तव्वए) पन्तु २१॥ એક પરમાણુ છે તે આનુવાં રૂપ નથી, કારણ કે તે કોઈ બીજા પરમ હું વડે સંસ્કૃષ્ટ દેતું નથી બે પ્રદેશવાળા જે સ્કંધ છે તે આનુપૂર્વી રૂપે અને અનાનુપવી રૂપે વ્યક્ત થવું અશકય છે તેથી તે અવકતવ્ય છે જે એવી વાત ता (तिपएसिया आणुपुन्वीओ जाव अणंतपएसियाओ आणुपुब्बीओ) १९ પ્રદેશેવાળા સમસ્ત સ્કંધે આનુપૂર્વીએ રૂપ છે, અને અનંત ચન્તના પ્રદેશેવાળા જેટલા કંધે છે તેઓ પણ આનુપૂર્વી એ રૂપ છે.
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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