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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका. सू० ४७ द्रव्यस्क व निरूपणम् भणितम् । नवरं कन्यामला यावत् अथ कोऽसौ ज्ञायकशरीरभव्यशरीरयतिरिक्तो द्रव्यस्कन्धः १ ज्ञायकशरीर भव्यशरीरव्यतिरिक्तो द्रव्यस्कन्धस्त्रिविधः मज्ञप्तः, तद्यथा - सचित्तः अचित्तो मिश्रकः ॥ ४७ ॥ २१७ ૧૯ टीका - 'से कि त' इत्यादि । व्याख्या निगः सिद्धा ||४०४७|| सिक्लियं सेसं जहा दव्वा वस्सए तहा भाणियव्त्रं) उत्तर - आगम से- आगम को आश्रित करके - द्रव्यस्कंध का स्वरूप इस प्रकार से है, जिस साधु आदि ने कंत्र इस पदके अर्थ को गुरु के मुख से सीख लिया है यहां से लेकर “ठियंजियं" आदि शेष पदों को यहां कहना चाहिये और उनका अर्थ जिस प्रकार से द्रव्यावश्यक के वर्णन में कहा गया है वैसा ही अर्थ यहां पर उस पाठका लगा लेना चाहिये । इस तरह स्कंध संबन्धी आलाप " अथ कोऽसौ शायकशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तो द्रव्यस्कंधः" यहां तक समझलेना चाहिये । (जाण यसरीर भवि यसरीरवइरित्ते दव्वखधे तिविहे पण ते ज्ञायकशरीर भव्यशरीर से व्यतिरिक्त द्रव्यस्कंध तीन प्रकार का कहा गया है । (तंजहा) वे प्रकार ये हैं (सचि अचित्ते भीसए) सचित्त, अचित्त और मिश्र । भावार्थ:- शिष्य ने गुरुमहाराज से पूछा है कि हैं भदन्त ! द्रव्य स्कंध का क्या स्वरूप है ? तब गुरु महाराज ने उसे समझाने के लिये ऐसा कहा कि हे शिष्य । द्रव्य स्कंध को स्वरूप दो प्रकार से निर्धारित किया गया है-१ દ્રવ્યસ્કન્ધનું સ્વરૂપ આ પ્રકારનું છે-“ જે સાધુએ સ્કન્ધ, આ પદના અને ગુરુની सभीचे शीभी सीधे छे" अडींथी श३ उरीने "ठियं जियं" माहि द्रव्यावस्था સૂત્રમાં આવેલા પદ્માને અહીં પણ ગ્રહણ કરવા જોઇએ. તે દેના જે પ્રકારના અર્થ દ્રશ્યાવશ્યક સૂત્રમાં કરવામાં આવ્યા છે, તે પ્રકારના અથ અહી પણ थषु थवा हो या अरे अन्ध संबंधी " अथ कोऽसौ ज्ञायव शरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तो द्रव्यस्कन्धः" अहीं सुधीनु' अथवु लेये. (जाण सरीरभवि यसरीरखहरिते दव्वबंधे तिविहे पण्णसे) ज्ञायशरीर અને ભયશરીર વ્યતિરિકત (થી ભિન્ન) દ્રવ્યત્સ્ય ત્રણ પ્રકારને હ્યો છે. (तं जहा) ते अमरो मा प्रभाछे (सचिते अचित मीस ) ( 1 ) सत्ति (२) अथित्त भने (3) मिश्र. ભાષા-શિષ્ય ગુરુ મહારાજને એવા પ્રશ્ન પૂછે છે કે હે ભગવન્ ! દ્રય*ધનું સ્વરૂપ કેવું છે?' ત્યારે ગુરુ તેને તે સમજાવવા માટે ભેદ પ્રભેદપૂર્વક તેના સ્વરૂપતું નીચે પ્રમાણે નિરૂપણ કરે છે. તેઓ તેને કહે છે કે દ્રવ્યકધનું સ્વરૂપ એ પ્રકારે નિર્ધારિત કરી શકાય છે
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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