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________________ __ १९९ अनुवोगन्द्रिका टीका सूत्र ३९ भाषश्रुतनिरूपणम् सद नो आगमतो द्वन्यातम् । द्रध्यक्षुतमपि सर्व निरूपितमिति चयितुमाहसे त दम्बमुय' इति । तदेतद् द्रव्यश्रत वर्णितम् ॥मू० ३८॥ अध भावभुन निरूपयतिमूलम्--से कि तं भावसुयं ? भावसुयं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा आगमओ य, नोआगमओ य ॥सू० ३९॥ छाया-अथ किं तद् भावभुतम् ? भावभुत विविध प्रज्ञतं. तद्यथा-आगमतश्च नोआगमतश्च सू० ३९॥ टीका--शिष्य पृच्छति-से कि त भावसुय" इति । अाकिं तद् भावश्रुतम् ? इति, उत्तरमाह-मावसुय" इत्यादि । भावश्रुतम्-इह श्रुतपदार्थाशरीर से व्यतिरिक्त द्रव्यभुत है । (से तं नोआगमओ दध्वसुयं) इस तरह नोआगम का आश्रित करके समस्तद्रव्यश्रुत का निरूपण हो चुका । (से तं दव्वयं) यही सब द्रव्यश्रुत का स्वरूप है । ॥मत्र ३८॥ अब मत्रकार-भावश्रुत का वर्णन करते है“से किं त भावसुर्य" इत्यादि । सूत्र॥ ३९ ॥ शब्दार्थ:-(से कित) शिष्य पूछता है कि हे भदन्त ! पूर्व प्रक्रान्त भावथुन का स्या स्वरूप है? उत्तर-(भावसुर्य) भावश्रुत (दुविहं पण्णत) दो प्रकार का कहा गया है। श्रुत रूप पदार्थ के अनुभव से युक्त जो साधु आदि जीव है वह भार शब्द का वाच्यार्थ है । भाव और श्रुत इन दोनों में अभेद के उपचार से भावश्रत साध्वादि को कहा गया है। इस तरह भाव जो है वही श्रुत बन जाता है। दम्बसुयं)मा शत नाम द्र०यश्रुतना थे महानु नि३५९५ मी समास याय ®. (से तं दमयं) भने द्र०यश्रुतना मां बेटोनु नि३५५५ ५५ मी ५३ થાય છે. સૂત્ર ૩૮ છે "से किंतं भावसुयं" त्याह शा-(से किं त भावसुयं?) शिष्य गुरुने सो प्रल छ छ । ભગવન્! પૂર્વપ્રસ્તુત ભાવકૃતનું સ્વરૂપ કેવું છે? उत्त२-(भावमुयं दुविहं पण्णत्तं) मावश्रुत मे ॥२नु छ. श्रुत३५ ५४ा. ના અનુકવવી યુક્ત જે સાધુ આદિ જેવો હોય છે તેઓ ભાવ શબ્દના વાસ્યાથ રૂપ છે ભાવ અને શ્રત આ બન્નેમાં અભેદના ઉપચારની અપેક્ષાએ સાધુ આદિને ભાવથી કહેવામાં આવેલ છે. આ રીતે જે ભાવ છે એજ શ્રત બની જાય છે.
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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