SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 187
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १७४ अनुयोपटाराने पूर्वकमाराधनीय-' मित्यात्मपरिणामयुक्ताः इयर्य। : तथा तदप्तिकरणातस्मिन् आवश्यके अर्पितानि-याथातथ्येन नियुक्तानि करणानि=तत्साभकमृतानि देहरजोहरणसदोरकमुखवस्त्रिकादीनि यै ते तथा, आवश्यककर्मणि सम्यग्यथा स्थानन्यस्तोपकरणा इत्यर्थः, तथा-तद्भावनाभाविताः-तस्य-आवश्यकस्य भावनाआवश्यक-सर्वकल्याण-पारणम, अनन्तभवोपार्जित कर्मरजोऽपहारक-मिति प्रतिक्षण-मनुस्मरणरूपा, तया भाविताः प्रमादपरिहारपूर्वक परमोत्साहेन आवश्यक क्रियाकरणपरायणाः, अन्यत्र कुत्रा · मनः अकुर्वन्तः, उपलक्षण वाचं कायं चान त्रा कुर्वन्तः उभयकाले रत् विपकं कुर्वन्ति तदेतल्लोकोत्तरिकं भावावसुख को प्राप्त करा देता है अतः यह अश्य उपयोगपूर्वक प्रशस्ततर संवेग के साथ निवेंदपूर्वक आराधनीय है इस प्रकार के आत्मपरिणामों से जो युक्त हैं ऐसे श्रमण आदिजन "तदद्वस्वउत्ते' इस पद के वाच्यार्य हुए हैं। तथा-जिन्हों ने आवश्यक में यथास्थान तत्साधकभूत देह, रजेहरिण, सदारव मुखवत्रिका आदिकों को नियुक्त कर रखा है अर्थात् आवश्य क्रया में अच्छी तरह से उ होने यथा स्थान उपकरणों को रखा है ऐसे वे श्रमण आदि जन "तदप्पियकरणे" पद के वाच्यार्थ हुए हैं। आवश्यक समस्त कल्याणां । कारण है तथा अनंत भवे पार्जित कम रज का नाशक है इस प्रकार की प्रतिक्षण में अनुस्मरणरूप भ.वना से जो प्रमाद परित्यागपूर्वक परमोत्साह से आवश्यक क्रिया के करने में परायण बने हुए हैं ऐसे श्रमण आदिजन "तम्भावणाभाविए" पद के वाच्यार्थ हुए हैं। मन यह पद बचन और कायका उपलक्षण તે કારણે તે અવશ્ય ઉપગ પૂર્વક પ્રશસ્તતર સંવેગની સાથે, નિર્વેદપૂર્વક આરાધનીય છે,” આ પ્રકારના આત્મપરિણામથી જેઓ યુકત હોય છે એવાં શ્રમણ माहिन "तदवोवउत्ते' । पहना पाया ३२ अ ४२१॥ ये આવશ્યક ક્રિયા કરતી વખતે તે ક્રિયાના સાધનભૂત દેહ, રજોહરણ, સરક મુહપતી આદિ ઉપકરણને જેમણે યોગ્ય સ્થાને રાખેલાં છે એટલે કે આવશ્યક ક્રિયામાં જેમણે ઉપકરણને બરાબર વિચાર પૂર્વક ઉચિક સ્થાને સ્થાપિત કરેલાં છે, તે अभय माहिने 48 "तदपियकरणे' मा पहना पाश्या ३५ समये. આવશ્યક ક્રિયાઓ સમસ્ત કલ્યાણની જનક છે, તથા અનંત ભપાર્જિત કમજને નાશ કરનારી છે.” આ પ્રકારની પ્રતિક્ષણે અનુસ્મરણ રૂ૫ ભાવનાથી પ્રેરાઈને જેઓ પ્રમાદના ત્યાગ પૂર્વક અને પરમત્સાહ પૂર્વક આવશ્યક ક્રિયાઓ ४२वाने पसय भनेता छे सेवा श्रम आहिन "तन्माणाभ विए" मा पहना વાયાર્થ રૂપ સમજવા જોઈએ.
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy