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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सू० २८ लोकोत्तरिकभावावश्यकनिरूपणम् १७३ पयोगरूपं येषां ते तथा. आवश्यक विशेषोपयोगवन्तः, तल्लेश्याः-तम्मिन्-आवश्यके एव श्या-शुभपरिणामरूपा येषां ते तथा, आश्यके शुभपरिणामवन्तः, तश-तदध्यवसिताः-जमिन-आवश्यके एतच्चित्तवादिना अपवसितम्अध्यवसायः वि.यासम्पादन विषयों येषां ते तथा, आ.३ क क्रियासंपादनविषयकविचारयुक्ता', तथा-तत्तीबाध्यवसानाः-तमिन् आवश्यके एव तीवं प्रारम्भकालादेव प्रतिक्षणं प्रवर्धमानम् अध्यवसानम् इदं सकलकर्मनिर्जराजनके तस्मादवश्यमाश्रयणीय'-मित कारक आत्मपरिणामो येषां ते तथा, तदोपयुक्ताः आवश्यक ार्थोपयुक्ताः-'आवश्यक-सामायिक-चनुविंशतिरतद-वन्दन-प्रतिव्र मणकायोत्सर्ग-प्रत्याख्यानरूपं यदवश्यं शाश्वतमचलमरुजमक्षयम वाधममन्दानन्दसन्दोहरूपं शिवसुखं प्रापयति, तामादवश्यं सोपयोगं प्रशस्ततरसंवेगनिवेदजानना चाहिये । जिनका उपयोग विशेषरूप से आवश्यक क्रिया में लगा हुआ है ऐसा श्रमण भादि जन "तम्मणे' इस पद के चर्थ हुए जानना चाहिये । आवश्यक क्रियाओं के संपादन विषयक विचारों से जो . युक्त हैं ऐमे श्रमण आदिजन “तदज्झः सिए" इस पद के वाच्यार्थ हुए जाननाचाहिये। तथा जिनका आत्मपरिणाम प्रारम्भकाल से ही इस प्रकार के विचार से कि यह आवश्यक सकलकमी की निर्जरा का जनक है इमलिये अवश्य आश्रयणीच है, प्रतिक्षण वृद्धिंगत होता रहता है वे श्रमण आदिजन तत्तिवज्झवमाणे" इस पद के वाच्यार्थ हुए हैं। आवश्यक में जिन के परिणाम शुभ हैं वे 'तल्ले रसे" पद के वाच्यार्थ-जानना चाहिये । आवश्यक-सामायिक चतुर्वि तिम्तव, वंदन प्रतिक्रमण, कार्योत्सर्ग इनरूप हैं, सो यह अक्षय, शाश्वत, अचल, अरु?, अभय, बाध और अनन्द आमन्द के सन्दोहरूपशि - भापश्य छियासमा ७५योय यु-त येसा छ मेवा श्रमाने महामणे" આ પદના વાર્થ રૂપે પ્રયુકત થયેલા સમજવા. , આ અવશ્યક આશ્રયણીય છે,” આ પ્રકારની વિચાર ધારાથી જેમનું આત્મ- પરિણામ આરંભકાળથી જ યુક્ત રહે છે, અને તમે કમે જેમનું આ પ્રકારનું मात्मपरिणाम द्धि पाम २३ छ, मेवा श्रमहिने मी "तत्तिबज्यवसाणे" આ પદના વાચાર્થ રૂપ સમજવા. આવશ્યક ક્રિયામાં જેમના પરિણામ શુભ છે mai भएy माहिने मी "तल्ले से" मा ५६ना पाच्या ३५ समा नये. सामायि, २४ तिथ शनी २तुति, वन, प्रतिng, सियाEि રૂપ જે આવશ્યક છે, તેઓ શાશ્વત, અચલ, અજ, અક્ષય, અવ્યાબાધ અને અમન્દ આનંદના સોહરૂપ (સમુદાયરૂ૫) શિવ સુખની પ્રાપ્તિ અવશ્ય કરાવી દેનાર છે, અને
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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