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________________ अनुयोगचन्द्रिका का.स.०२१ कुप्रा चनिय द्रव्यावश्यकम्वरूपं द्वितीय निरूपणम् १४३ गृहिधम धर्मचिः काविरुद्ध विरुद्धवृद्धश्रावकप्रभृतयः पापण्डस्थाः कल्पे प्रादु भातायां रजन्यः यत् तेजसा उ लति इन्द्रस्य वा स्कन्दस्य पा रुद्रस्य या शिवस्य वा वैश्रवणस्य वा देवस्य वा नागस्य वा यक्षस्य वा भृतस्य वा मुकुम्यस्य मा आर्याया वा दुर्गा वा कोट्टक्रियाश वा उपलेपनसम्माजनावर्षणधूपपूष्पगन्धमाल्य दिकानि द्रव्याक' कानि कुर्वन्ति । तदेतत् कुप्रावचनिक द्रव्यावश्यकम् ॥ मू० २१ ॥ धम्मचिंतगं अनिरुदविरुद्धघुसावगप्पभितओ पासंडत्था) जो ये चरक, चीरिक, चर्मखंडिा, निक्षोण्ड, पाण्डुराड़, गोनम, गोव्रतिक, गृहि, धर्माधर्म चिंतक, अविरूद्ध, वितु, और वृद्ध. श्रावक आदि हैं कि जो षण्डम्य अपने आप को व्रती मानते हैं (कल्लं पाउप्पभायाए रयणीए जाव तेयसा जलंते) सामान्य प्रभात होने पर प्रभातप्राय रजनी के होने पर यावत् तेज से ज्वलित सये के उदय होने पर (इंदरसवा) इन्द्र की (खंदस्स वा) अथवा स्कंद-कार्ति क स्वामी की (रुद्दम्स वा) अथवा रुद्र की (सिवस्स वा) अथवा शिव की (वेसमणस्स वा) अथवा वैश्मण की (देवस्स बा) अथवा सामान्य देव की (नागरस वा) अथवा नाग की (जक्खस्स वा) अथवा यक्ष की (भूयस्स वा) अथवा भूत की (मुगुदस्सवा) अथमा मुकुद की (अज्जाए वा) अथवा आर्यादेवी की (दुग्गाए वा) अथवा दुर्गा कि (कोकिरियाए वा) अथवा कोट्टक्रिया की (उवलेण संमज्जणआवरिसण-घूवपुकगंधमल्लाइयाइंदावर: या याति-से तं कुप्पावयणियं हिधम्मयम्मचिंतगअ वरूद्धविरुद्ध सावगप्पमित आ पासंड था) ने २१ २२५ या२ि४, यम, लि. पांडा. गौतम, गोप्रति४, डियर्मा, धाथि-तह, અવિરૂદ્ધ અને વૃદ્ધ શ્રાવક અ દિ છે કે જેઓ પાષડથ છે-જેઓ પોતાની જાતને વતી માને છે (આ બધાં પદેને અર્થ શબ્દાર્થને અને તે સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યે ) (कल्लं पाउपभायाए र णीए जाच तेयमा जलंते) तेथे। सामान्य प्रभात Aniલગભગ રાત્રિને અન્તકાળ સમીપ આવે ત્યારે ભળભાંખળું થાય ત્યારે અને સૂર્ય पाताना सखरिणाथी प्रथा दागे त्यारे इंदरस ग)-द्रनी म:(वंदरसा ) २४नी-ति२पामिनी, (रुहस्स) #२८नी (सिकस्स वा) 424ा शिवनी (वेसमणम्स वा) मा वैश्रमनी मेरनी. (देवरस वा) ॥24॥ सामान्य हेवना (नागस्स बा) नानी (जक्रवरस ) २.५। ५क्षनी. (भूयस्स वा) मया भूतनी (मुगुदस्स वा) मथ।। भुनी (अज्जाए वा) मया माहिवामी (दुग्गाए वा) भया दुगनी (कोट्टकरियाए वा) 224 [यानी (उवटे वण, संमज्नणआररिसण-धूव पुष्फ गंधमल्लाइयाइ दवावस्सयाई करेंति से तं कुप्पावणिय
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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